29 जनवरी 2015

क्या दूँ मैं तुमको भला

पढ़ा तुम्हारी आँख  में, जैसा  पहली  बार
वैसा ही मिलता रहा, प्रिया तुम्हारा प्यार

वस्त्रों में तुमने चुना, गरिमामय परिधान
साड़ी ही  पाती  रही, सामाजिक  सम्मान

पत्र-पत्रिका डाक से, मिलतीं नित्य नवीन
सर्वप्रथम मुझको पढ़ो, होकर तुम तल्लीन

गूँजे हैं एकांत में, घर में ही पदगान
मीरा को सुनते रहे, दीवारों के कान

सदा व्यस्त गार्हस्थ में, तुम्हीं पीटतीं ढोल
शयन कक्ष की पुस्तकें, खोल रहीं हैं पोल

मोहपाश में बाँधता, प्रिये! मुझे उपहार
घिसा हुआ है देख  लो, कुर्ता  धारीदार

घर पर कोई था नहीं, दिखे नहीं पद-त्राण
तुम केवल मंदिर गईं, निकल गए थे प्राण

क्या दूँ मैं तुमको भला, क्या है मेरे पास
दोहे हैं  दो- चार ये, यह दौलत है  ख़ास

बिंदिया चमके भाल पर, भरा रहे सिंदूर
यही कामना है सदा, खुशी मिले भरपूर

बाह्य सौंदर्य हो न हो, अंदर रहे कवित्व
प्रथम दृष्टया मोह ले, ऐसा हो व्यक्तित्व

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