9 सितंबर 2016

दर्द की ख़ुशियाँ

रीज़नल मैनेजर ने सम्पतकुमार का स्थानान्तर ‘विवेकानुसार अधिकार’ का उपयोग करते हुए तिरुचिल्लापलि से लखनऊ कर दिया। हेड आॅफिस से एप्रूवल भी हो गया। वैसे रीज़न में ही अधिकारी को रखने की परम्परा रही है। लेकिन सम्पत का केस अपवाद था। उन्होंने निरस्त करवाने के प्रयास भी किए, पर असफल रहे। सोच लिया कि जब काम ही करना है, तो क्या उत्तर और क्या दक्षिण। सारे देश को घर समझना चाहिए। फिर इस बहाने ही सही उत्तर भारत भी देख लेंगे। वहाँ के लोग और उनकी भाषा का अध्ययन-अनुभव हो जाएगा। कुछ ग़ज़लें और लिख ली जाएँगी। एक-दो पुस्तकें और तैयार हो जाएँगी। ऊपरवाला सब संयोग बनाता है। उन्होंने ट्रांसफर लेटर ऐक्सेप्ट कर लिया।

लखनऊ कार्यालय में चैम्बर मिलते ही मातहतों, बाबुओं यहाँ तक कि चपरासियों तक को बुला-बुलाकर अपने हाथ से मिठाई बाँटी गई। कहा गया कि यह मेरी बेटी ने स्पेशल आप सबके लिए बनाई है। बड़े साहब के हाथ से मिठाई मिले। किसे अच्छा नहीं लगेगा ? सारे आॅफिस में सम्पतकुमार के चर्चे होने लगे। नए साहब ने अपने मृदुव्यवहार और काम-काज के तरीकों से सबका मन जीत लिया। स्टेब्लिसमेंट की फाइलें उन्हीं के पास रहतीं। सम्पत यह देख लेते कि कौन कहाँ का रहने वाला है ? घर से कितनी दूरी पर है ? उसे नौकरी में असुविधा तो नहीं हो रही है ? उसके परिवार में कौन-कौन हैं। उसके क्या दुख-दर्द हैं ? उसका जन्मदिन कब है ? सम्पत ने अपनी पर्सनल डायरी में सबकी जन्म तारीखें नोट कर लीं।

जब कभी किसी कर्मचारी या अधिकारी का जन्मदिन आता, तो उसे अपने घर से मिठाई ले जाकर खिलाते। आग्रहपूर्वक कहते कि मेरी ओर से तुम्हारे जन्मदिन पर पूरे स्टाॅफ को मिठाई खिलाओ।

हर माह किसी न किसी का जन्मदिन आ ही जाता। सत्ताइस कर्मचारियों के स्टाॅफ में  कभी-कभी तो दो-दो बार जन्मदिन आ जाते। लेकिन सम्पत कभी नहीं भूले। उनकी बेटी को मिठाई बनाने का बड़ा शौक़ था। इस बहाने मन में उत्सवी माहौल हो जाता। दिन भर उनकी प्रसन्नता टपकती रहती. वे बेटी को बहुत प्यार करते थे। उनका यह सोच रहा कि कार्यालय भी एक प्रकार से घर का ही रूप है। पारिवारिक वातावरण प्रदान कर हम कर्मचारियों की कार्य-क्षमता को बढ़ा सकते हैं। अच्छे से अच्छा आउटपुट ले सकते हैं।

घर की जवाबदारियों के बाद भी कभी सम्पत ने ऑफ़िस का समय नहीं चुराया। वह समय पर तैयार होकर सुबह-दस बजे गाड़ी स्टार्ट कर लेते। उनके लिए दस-तीस का मतलब दस-तीस ही होता। हर कर्मचारी के जन्मदिन पर मिठाई का डिब्बा लाना वह कभी नहीं भूलते। ऑफ़िस के नीचे कार की आवाज़ यह बता देती कि सम्पत साहब की गाड़ी आ गई है। कर्मचारी घड़ी मिलाने लगते। उनके समय की पाबंदी ने कई कर्मचारियों को बिना लेटर दिए ही सुधार दिया।

इस बार नवम्बर में संयोग से एक के बाद एक चार जन्म दिन आ गए। रिकार्ड क्लर्क के जन्मदिन पर बेटी को गुलाब जामुन पसंद होने से पहली बार वे गुलाबजामुन ले आए। दूसरी बार जब प्यून का जन्म दिन आया, तो सोचा कि मावाबाटी ठीक रहेगी। तीसरी बार सीनियर असिस्टेंट का जन्म दिन आ गया, तब बेसन के लड्डू हो गए। अब चैथी बार सैकण्ड मैनेजर के जन्म दिन पर सम्पत समझ नहीं पाए कि कौन-सी मिठाई लाई जाएँ। काफी सोच-विचार के बाद मावे की चक्की का निर्णय लिया गया।

छब्बीस नवम्बर को सैकण्ड मैनेजर का जन्मदिन था। जन्मदिन के कारण वे आॅफिस लेट पहुँचे। बच्चों व पत्नी ने घर पर छोटा-सा कार्यक्रम आयोजित कर लिया था। लेकिन सम्पत तो सम्पत थे। समय के पाबंद। मजाल साड़े-दस बजे मिनट का काटा घड़ी में छः के अंक से आगे बढ़ जाए। सम्पत ने ग्यारह बजे सैकण्ड मैनेजर के आते ही उनके मुँह में मावे की चक्की का एक पीस ठूँस कर गले से लगा लिया . कहते हुए कि ‘लीजिए ! मैनेजर साहब हमारी ओर से मिठाई खाइये और  सारे आॅफिस में खुशियाँ बाँट दीजिए।’ मिठाई का डिब्बा हाथ में थामते हुए सैकण्ड मैनेजर को बड़ा अजीब-सा लगा। अंदर का संकोच चेहरे पर झलकने लगा। फिर भी साहब का कहा आदेश मानकर पूरे स्टाॅफ को मिठाई खिलाते रहे। सब ने सैकण्ड मैनेजर साहब के बदले सम्पत साहब की जय बोली।

शाम को सम्पत घर लौटे तो कुछ थके हुए से लगे। उन्हें अपना काम स्वयं करने की आदत है। रात में बुख़ार भी आ गया। सुबह उठने में देर हो गई। तैयार भी हुए पर मन नहीं लगा। हाथ-पैर दर्द करते रहे। फिर बिस्तर के हवाले हो गए। यों तो लखनऊ आए को आठ-दस महीने हो गए । पर आज पहली बार उन्हें ऑफ़िस फ़ोन करना पड़ा  ‘ भाई बुख़ार के कारण में नहीं आ पा रहा हूँ, आप लोग देख लेना।’

‘यस सर ! आय वील मैनेज हियर, डोंट वरी।’ कहकर सैकण्ड मैनेजर ने ऑफ़िस कार्य संभाल लिया। दिन भर हेड आॅफिस से कोई फ़ोन नहीं आया। सब कुछ ठीक-ठाक रहा। जो रिपोर्ट भेजना थीं, भिजवा दी गई। आज की सारी रसीदें कट गईं। पोस्टिंग हो गईं। सैकण्ड मैनेजर ने ध्यान से सारे लाॅक चेक कर लिये। शाम को घर जाते समय गाड़ी साहब के फ्लैट की तरफ मोड़ ली। सोचा कि दिन भर की रिपोर्टिंग हो जाएगी व साहब की तबीयत के हालचाल भी ले लेंगे।

मैन रोड के पास ही नई मल्टी में सम्पत साहब का 301 नम्बर का फ्लैट है। सीढ़ियों के पास ही नेमप्लेट लगी है। सम्पत कुमार, डिविज़नल मैनेजर,.......................................जैसे ही उन्होंने हाॅल का आधा टिका हुआ दरवाज़ा खोला, साहब को दवाइयों के कारण नींद आ गई थी। पास की टेबल पर मोबाइल, कुछ गोलियाँ, विक्स वेपोरब आदि रखे थे। यकायक दीवार पर निग़ाह चली गई। हाॅल के अनुरूप आॅफिस नुमा घड़ी लगी है। अरे ..................यह क्या ! एक दस-बारह वर्ष की हँसती-खिलखिलाती फ्राक पहनी सुंदर-सी बच्ची के फ़ोटो पर ताज़े फूलों की माला टँगी है..........................। उनकी विस्फारित आँखें खुली की खुली रह गईं। वे स्तब्ध रह गए। आँखें भर आईं. फ़्लैट में कोई हलचल नहीं. फ़ोटो के नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था।

‘तुम्हारी मिठाइयाँ’

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