18 जनवरी 2015

प्रिये ! तुम्हारे पत्र

पत्र देखकर यों लगा, तुम ही खड़ी समक्ष
बिना पढ़े ही महकता, स्वयं अध्ययन कक्ष

निजी पत्र पीछे रखे, आगे रखीं किताब
जैसे रखे सहेज कर, ताजे़ लाल गुलाब

रखीं पुस्तकें धूप में, दिखे तुम्हारे पत्र
बिना पढ़े मस्तिष्क में, कौंध गए वे सत्र

घर में थाती नेह की, कहीं नहीं अन्यत्र
अलमारी में हैं सभी, प्रिये! तुम्हारे पत्र

चलन पुराना हो गया, प्रेम-प्यार के पत्र
अब युगलों के हाथ में, चलित फोन सर्वत्र

मिली पुरानी डायरी, दिखे तुम्हारे चित्र
जैसे मन के कक्ष में, आ बैठा हो मित्र

तुम्हें नया एनक मिला, मुझे हुई तकलीफ
घर में होती ही नहीं, बिना वज़ह तारीफ

लाख बुरी तबियत रहे, जाग बिताओ रैन
बिना किए गृहकार्य के, तुम्हें न पड़ती चैन

सुबह-शाम गरमागरम, भोजन अति स्वादिष्ट
मिला तुम्हारे हाथ का, तब हम हुए विशिष्ट

रखकर भूला हूँ सदा, मैं ही अपनी चीज़
तुमने ही कल खोज दी, मेरी हरी कमीज़


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