अनबन घर में है नहीं, लेकिन पसरा मौन
सप्तपदी के वचन अब, याद रखेगा कौन
आज अबोली तुम रहीं, मैं भी था चुपचाप
तुमको उसका दर्द है, मुझको पश्चाताप
तुमने चुप्पी साध ली, खामोशी चहुँओर
चलो मौन की साधना, होने दो पुरजोर
तुमने की हरतालिका, चेहरा सुस्त, उदास
मैंने अपने दूध का, सरका दिया गिलास
जब से तुम मैके गईं, घर हो गया उदास
जैसे खुशियों को मिला, आजीवन वनवास
रोटी- सब्जी बन रही, बना नहीं कुछ ख़ास
तुमने लम्बा कर लिया, अब की बार प्रवास
तुम्हीं बनी हो दीपिका, मुझको दिया उजास
पारस छूकर लोह ज्यों, स्वर्ण कहाता ख़ास
कठपुतली की भांति तुम, निभा रहीं दायित्व
स्वामी हम हैं नाम के, तुम्हें प्राप्त स्वामित्व
निष्ठा-श्रद्धा एक-सी, एक हृदय दो जान
क्या होगी दाम्पत्य की, और श्रेष्ठ पहचान
घर-आँगन कच्चा रहा, छत जैसे खपरैल
लेकिन तुम हँसती रहीं, रखा न मन में मैल
सप्तपदी के वचन अब, याद रखेगा कौन
आज अबोली तुम रहीं, मैं भी था चुपचाप
तुमको उसका दर्द है, मुझको पश्चाताप
तुमने चुप्पी साध ली, खामोशी चहुँओर
चलो मौन की साधना, होने दो पुरजोर
तुमने की हरतालिका, चेहरा सुस्त, उदास
मैंने अपने दूध का, सरका दिया गिलास
जब से तुम मैके गईं, घर हो गया उदास
जैसे खुशियों को मिला, आजीवन वनवास
रोटी- सब्जी बन रही, बना नहीं कुछ ख़ास
तुमने लम्बा कर लिया, अब की बार प्रवास
तुम्हीं बनी हो दीपिका, मुझको दिया उजास
पारस छूकर लोह ज्यों, स्वर्ण कहाता ख़ास
कठपुतली की भांति तुम, निभा रहीं दायित्व
स्वामी हम हैं नाम के, तुम्हें प्राप्त स्वामित्व
निष्ठा-श्रद्धा एक-सी, एक हृदय दो जान
क्या होगी दाम्पत्य की, और श्रेष्ठ पहचान
घर-आँगन कच्चा रहा, छत जैसे खपरैल
लेकिन तुम हँसती रहीं, रखा न मन में मैल
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