30 दिसंबर 2014

यही मिला दाम्पत्य का

चौके में कबिरा तुम्हीं, कभी तुम्हीं रसखान
भोजन हो सामान्य जो, बन जाता मिष्ठान

सम्बोधन सुनकर नहीं, अपितु समझ भावार्थ
चाय तुम्हारे हाथ की, कवि को करे कृतार्थ

यद्यपि हो वामांगिनी, यही तथ्य है सत्य
दोनों  अंगों  पर  मगर,  है  पूरा अधिपत्य

घर में मंदिर-सा लगे, आंगन में ब्रह्मांड
महावीर जब भी सुने, तुम से सुंदरकांड

भाग्यवान हो तुम स्वयं, पुत्र-पौत्र के ठाठ
सचमुच प्रतिफल दे गए, रामायण के पाठ

क्या मानूँ आभार मैं, व्यक्त करूँ क्या खेद
तुमने मन की आँख से, मिटा दिए मतभेद

तुम से है रूनझन यहाँ, तुम से है झंकार
तुम से ही बनता गया , जीवन इक त्योहार 

कंगन, कुंडल, करघनी, काजल, कुंकुं, केश
बिछिया, बिंदिया,बालियाँ, खुशियों के संदेश

यही मिला दाम्पत्य का, मुझको गूढ़ रहस्य
अष्टकूट से हो अधिक, मन का सामंजस्य 

बिंदिया उनकी शक्ति है, बिछिया है सम्मान
नई पौध को दीजिए , बस इतना सद्ज्ञान

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