9 सितंबर 2014

प्रेम सिखाती दीपिका

इधर दीप की रोशनी, उधर दीप का प्यार
सहे रूप ने रात भर, खु़द पर अत्याचार

दुश्मन जैसा दीप ये, भगा रहा अँधियार
बात-बात में धुल रहा, सजा-धजा श्रंगार

खलनायक की भूमिका, निभा रहा है दीप
निंदिया आई आँख में, प्रियवर हाय समीप

इधर दीप जलता रहा, उधर जली है देह
काजल है रुखसार पर, बरस रहा है नेह

प्रेम सिखाती दीपिका, प्रेम रत्न अनमोल
मीरा, कबिरा, सूर के, अमर हुए हैं बोल

दीपशिखा-सम नारियाँ, रचे स्वयं इतिहास
दुख में सुख को देखतीं, अंतस में विश्वास

भभक-भभककर दीपिका, रोई है जिस रात
हवा नक्सली क्या चली, खूब किया उत्पात

बीत रही है यामिनी, प्रियवर नहीं समीप
अँजुरी-अँजुरी रूप का, दर्द पिएगा दीप

दीप जला काजल धुला, टूट गई सौगंध
तोड़ दिए उजियार ने, सपनों के अनुबंध

दीप तनिक मद्धिम हुआ, हार गए संकेत
बुद्धि समझ पाई नहीं, भाव गए जब चेत

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