3 सितंबर 2014

बूढ़ी माँ दीपक धरे

चलो दिवाली आ गई, पूछ-परख आरम्भ
वैवाहिक अवसर बने, लगे माँगलिक खम्भ

पीले चावल द्वार पर, रखे दिवाली माह
ढोल-ढमाके घोड़ियाँ, चालू हुए विवाह

दीप धरे दीवार पर, भरे सुनयना साँस
पिया बसे परदेस में, चुभी हृदय में फाँस

दीप प्रवाहित कर रही, गोरी नदिया तीर
मन में है यह कामना, बदलेगी तकदीर

पूजन कर गोरी उठी, ले दीपों की थाल
जगमग-जगमग रोशनी, खुशियाँ हुईं निहाल

दो भागों में बाँटती, आँगन की दीवार
माँ ने दीपक धर दिया, बँटा नहीं फिर प्यार

बूढी माँ दीपक धरे, तुलसी चौरे पास
संभव है ये रोशनी, अंतस करे उजास

चूल्हे को दी दीप ने, थोड़ी आग उधार
माँ ने सेंकी रोटियाँ, मिला-मिलाकर प्यार

माँ दीपक रखती रहीं, वही ताक है बंद
आँगन की दीवार ने, छीन लिया आनंद

घृत की डिब्बी, वर्तिका, रोली, अक्षत, दान
बहू संभाले तीर्थ में, माँ जी का सामान

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