19 अगस्त 2014

दीप-दान बहकर गया

तिलतिल जलकर दीप ने, नाप लिया आकाश
जीवन भर ढोता रहा, अँधियारे की लाश

दीप-दान बहकर गया, गंगा के उस पार
खुशियाँ मन में भर गईं, वाह-वाह करतार

दीपक, गंगा-आरती, हर-पौढ़ी का घाट
मन के उजले हो गए, मैले हृदय कपाट

दीप-दान को देखकर, मन हो गया प्रबुद्ध
जीत गए संसार को, बिना लड़े ही युद्ध

माटी का इक दीप जब, बना स्वयं चैतन्य
देख-देखकर सृष्टि ने, कहा दीप तू धन्य

चढ़ा दीप की श्रंखला, उसका करें उतार
मनो-कामना पूर्ण हो, पवन-पुत्र के द्वार

धर्म-कर्म यज्ञादि या, पूजन-पाठ विधान
दीप जलाकर ही मनुज, चढ़े नए सोपान

धूप, दीप, नैवेद्य औ’, पूजन- अर्चन मान्य
मगर मान्यता भाव की, भावों का प्राधान्य

मन में शंका घर करे, संकट लगे समीप
अगर बुझा है भूल से, इष्ट-देव का दीप

राष्ट्र-धर्म की राह में, जो जन आए काम
अमर दीप हैं देश के, जनमन करे सलाम

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