हमारी संस्कृति की पहचान है श्रावणी-पूर्णिमा।
उत्सवों, तीज-त्योहारों की धरोहर हैं ऐसे दिन। इन्हीं त्योहारों ने
संस्कारगत बीजों को सर्वजनोपयोगी वटवृक्ष बनाया है। रक्षाबंधन का दिन
पावनता का मानक प्रतिष्ठान है। यह परिवार के स्नेहिल विषयों का
विश्वविद्यालय है। यह पारिवारिक पारिजात के झरते पुष्पों का परागानन्द
है।यह सम्बंधों की श्वेत पताका तथा चंचल चित्त की एकाग्रता है। यह श्रावण
के उमड़ते-घुमड़ते मेघाच्छाादित आकर्षण के बीच चमकती दामिनी की चमक है। यह
मां की सहनशीलता का धरणी सरीखा स्पंदन है तथा विषाल हृदयी पिता के
स्वाभिमान का प्रतिफलन। यह कशीदाकारी है छोटी बहन के अनुपम प्यार की और
रक्षा-कवच है भाई की कलाई पर बड़ी दीदी के हाथ का ।
एक जमाना था जब
हम भाई-बहन घर में बहुत छोटे हुआ करते थे । बुआजी हाथ से बनाई रेशम के
धागों की राखी श्रावण की पूर्णिमा से पंद्रह दिनों पहले ले आती थीं। उनके
हाथ में गोटा किनारी का झोला हुआ करता था। और झोले में प्यार से सहेजी हुई
राखियाँ कुमकुम-तांदुल के साथ रखी जाती थीं। उनके आगमन की आतुरता हमारे
परिवार के साथ-साथ पड़ोसियों को भी होती थी। बुआजी केवल हमारी नहीं सारे
मोहल्ले की होती थीं। एक उत्सवी वातावरण श्रावण की पूर्णिमा से लेकर
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तक बना रहता था। पिताजी सरकारी नौकरी से छुट्टी लेकर
घर आ जाते थे। हम भाई-बहन पूछते तो बड़ी शान से कहा जाता ‘बेटा ! राखी पर
तुम्हारी बुआ आ रही हैं। ’इस तरह स्नेह का सुकोमल अहसास होता था, हमारी
संस्कृति के शुक्ल पक्ष की भाँति रक्षाबंधन। बहन के यशगान पर कहा गया है:-
‘बहिना है आराधना, पुण्यकर्म प्रतिरूप ।
प्रेमपूर्ण परिवार का, सत्यं शिवं स्वरूप’ ।।
सावनी घनघोर
घटाओं का आसमान में घुमड़ना, रिमझिम-रिमझिम फुहारों का बरसना, कुछ
भींगना-कुछ सूखना और बहनों की हंसी-ठिठोली के बीच युद्धस्तरीय तैयारियाँ
सजने-संवरने की, राखी की सतरंगी थालियाँ सजाने की ,एक सुखानुभूति थी, ठेठ
भारतीयता के देशी परिवेष की। आम्रकुंज के रज्जू-झूलों का रस तो उसमें था
ही, संस्कारों की शालीन खनक व पारम्परिक ठसक भी सुनाई पड़ती थी ।
अब विगत कुछ
दशकों में जीवन की प्रतिस्पर्धात्मक व्यस्तता, अत्याधुकिता व आपाधापी के
कालियादेह ने कुछ यों फन फैलाया कि पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व
वैचारिक धरातल सिमटता चला गया। बाज़ारवाद के परिप्रेक्ष्य में शब्दों ने नए
अर्थ गढ़ लिए। परिभाषाएं नए रूप में व्यक्त की जाने लगीं। बीसवीं सदी के
उत्तरार्द्ध ने हमें विकास के अंधकूप में उतार दिया। हम भूल गए कि बरसों की
सुसंस्कृत लोक-परम्पराओं, कृतियों-कल्पनाओं तथा सार्वजनिक संवेदनाओं में
ही तो छिपी है हमारी पुरातन संस्कृति। हमारी दीवारों के मांडने, संजाबाई के
गीत, गणगौर की पूजन तथा तुलसी चौरे के दीये, चाहे मिथकीय होकर लोक
परम्पराओं से जुड़े हों लेकिन निष्छल, निर्विकार व निद्वद्र्व जीवन का पाठ
पढ़ाने में समर्थ हैं।
यही वजह है कि
अब बहन स्वयं नहीं आती, कामकाजी और पढ़ी-लिखी हो गई है, देश-दुनिया को जानने
लगी है। अतएव कोरियर से लिफाफे में आने लगी है। और अब तो बहन नेट से आती
है। बहन मोबाइल से आती है। समय की करवट ने भाई को भी अधिक औपचारिक बना
दिया है। वह कारगिल की चोटियों पर कर्तव्य निर्वहन कर रहा है, प्रतियोगी
परीक्षाओं में जी तोड़कर जुटा है, और जम्प मिलने की लालसा में दूसरी जगह
ट्राय में लगा हुआ है ।
मन करता है कि
हमें फिर एकबार द्रौपदी और श्रीकृष्ण के पौराणिक प्रसंग की समसामयिक
व्याख्या करना होगी। हमें इतिहास में झाँककर दोहराना होगी कहानी रानी
कर्णवती और हुमायू जैसे संवेद्य-संदर्भों की। हमें अतीत के भावनात्मक
क्षणों को स्मरण करते हुए आत्मीयता के नए आकाश तलाशने होंगे। ऐसे आत्मीय
आकाश जो सामाजिक पुनर्संरचना में सहायक सिद्ध हों। भावनाओं की पावन श्रंखला
का निर्माण करें। परस्पर सहृदयता का वंदनीय विकास हो। आज के युग में जब
महिलाओं को समानता का दर्जा दिया जाना सामाजिक आवश्यकता बन गया है, तब भी
बहन या दीदी जैसे संबोधनों को व्यवहार में लाना रूढ़ीवादी नहीं माना जाना
चाहिए। महात्मा गाँधी ने अपनी एक पुस्तक मेें लिखा है: ‘सिनेमाघरों में
कार्य करनेवाले अभिनेता व अभिनेत्रियाँ भी तो हमारे ही समाज के भाई-बहन
हैं। सिनेमा जैसी कला में उनका व्यवहार शालीन होना चाहिए।’
आज के संदर्भ
में बहुराष्ट्रीयता, उदारीकरण, विदेशी पूँजी निवेश तथा सामाजिक
विश्वव्यापीकरण के परिप्रेक्ष्य में रक्षाबंधन जैसे श्वेत-पताकाओं वाले
सहज-सरल-स्नेहवाले, पावन-पुज्य मनोभावोंवाले त्योहारों का महत्व कई हज़ार
गुना बढ़ गया है। आज हमारी बहनें छुई-मुई-सी बालिकाएं नहीं हैं। वे
चारदीवारी की फूलपत्तीवाली शोभा भी नहीं हैं। वे आँगन की कोमल तुलसी की
क्यारी भी नहीं हैं। और विवाह के बाद पारिवारिक प्रतिष्ठा के नाम पर घर में
चुपचाप बैठी रहने वाली बहू भी नहीं रहीं। आज बहनें सार्वजनिक
उपक्रमों-शासकीय कार्यालयों में संगी-साथी हैं। देश की सीमाओं पर तैनात
सैनिकों की बहनें हैं। अनेकानेक उत्तरदायित्वपूर्ण सार्वजनिक व राजनीतिक
पदों पर नामचीन शख्सीयतें हैं ।
इसीलिए हमें नए
समय के द्वार पर भाई-बहनों के सम्बन्धों में रसीले आम का स्वाद भरना होगा।
बहन के शील की रक्षा का वचन दोहराना होगा । संवेदनाओं के बंद किंवाड़ खोलने
होंगे। तभी तो भाई के मन में लकड़ी के पाट पर पालथी मारकर बैठने की पात्रता
पैदा होगी। तभी तो निर्भीक होकर हाथ बढ़ेगा बहन की ओर। और तभी तो रक्षासूत्र
दोहराएगा अपनी पुरातन कहानी। सारी सामाजिक संवेदनाएं सशरीर साक्षी होंगी ।
रक्षाबंधन के इस पावन अवसर पर बहनें अपने नेह से आकाश झुकाती रहें। भाई का
रक्षण धरती को दृढ़ता देता रहे। यही कामना है।
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