8 अगस्त 2014

अँधियारे ने सत्य से

नई रोशनी चाहता, सिंहासन का पाट
संभव है पैदा करे, अँधियारे की काट

सबकी नीयत एक-सी, दिल्ली या भोपाल
जमा करो बस बैंक में, अँधियारे का माल

अँधकार में लिप्त हैं, सत्ता के गलियार
अब तो होना चाहिए, दीपकिरण के वार

लोकतंत्र के दीप को, फाइल का आघात
फाइल से फाइल करे, रुपयों की बरसात

लोकतंत्र का दीप है, जर्जर औ’ बदहाल
चलो थाम लें सत्य की, जलती हुई मशाल

भ्रष्ट आचरण से हुआ, लोकतंत्र लाचार
जैसे दीपक तेल का, गुल करता तैयार

गौरव है इस देश का, सत्य-धर्म, ईमान
आज कालिमा पुत रही, देखो खींचातान

दीप बुझे धृतराष्ट्र के, बंद प्रिया के नेत्र
भीष्म सरीखे मौन थे, तभी हुआ कुरुक्षेत्र

अँधियारे ने सत्य से, किये कई अनुबंध
न्यायालय में खा रहे, गीता की सौगंध

जहाँ सत्य विचलित हुआ, वहाँ झूठ का मान
अँधियारा पूजा गया, समझ अरे नादान

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