7 अगस्त 2014

कृष्ण दीप की रोशनी


लछमी, दुर्गा, शारदा, गणपति और महेश
युगों-युगों से दीप का, आराधक ये देश

कृष्ण दीप की रोशनी, राम दीप के प्राण
अंतस् के उजियार का, करते नवनिर्माण

राम नाम मणि दीप धर, तुलसी करे तलाश
आप प्रकाशित हो गए, जग में किया प्रकाश

नगर अयोध्या दीप से, रोशन औ’खुशहाल
मगर अभी श्री राम के, मन में कई सवाल

यों तो जग में यज्ञ के, होते विविध प्रकार
मगर मिले परलोक में, दीप-यज्ञ उजियार

धुआँ-जलन पीकर करे, जग में दीप उजास
तभी लिखा है लोक ने, गौरवमय इतिहास

सबके अंदर सत्य का, धक-धक करे प्रकाश
फिर भी दुनिया कर रही, बाहर उसे तलाश

मावस ने छलछिद्र कर, रहन रखा है अंश
तभी  दीप के पाँव में, अँधियारे का वंश

सम्मुख रखकर दीप को, देखो एक निगाह
वैचारिक एकाग्रता, लाती नया प्रवाह

हृदय जला है दीप का, भस्म हुए अरमान
फिर भी है प्रतिबद्ध वह, देने को बलिदान

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