अँधियारे ने भागकर, किया क्षितिज को पार।
बाती कहती गर्व से, मैं लाई उजियार।।
मेरे दम पर जगत में, फैला हुआ प्रकाश।
रात-रात भर तमस का, मैंने किया विनाश।।
सूत-सूत में है भरी,जीवन शक्ति अपार।
एक अकेली देह ने, जीत लिया संसार।।
दीप्तित लौ को देखकर, सहमा है अंधियार।
इसी-लिए उजियार पर, अब मेरा अधिकार।।
तत्पर होकर तेल ने, उड़ा दिया उपहास।
घोर तिमिर से युद्ध कर, मैंने किया उजास।।
तम की भेदी तेल ने, घुप्प स्याह दीवार।
तब जाकर उजियार ने,लिया आज अवतार।।
नेह दिया है तेल ने, सांस-सांस में प्राण।
उसके उर-उत्सर्ग का, रीता दिया प्रमाण।।
पल पल सींची वर्तिका, तन मन हुआ विलीन।
तभी भगी है कालिमा, होकर सत्ताहीन।।
अहम देखकर तेल का, बाती का गुणगान।
दीप भला क्यों चुप रहे, करने लगा बखान।।
मौनभंग कर दीप ने, किया प्रखर प्रतिवाद।
घोर अमा से बहस का, पलपल मुझको याद।।
क्षीण-काय है वर्तिका, कर्पूरी है तेल।
मुझ दीपक के पाहुने, मुझसे खेलें खेल।।
सदियों से जग में हुआ, मेरा ही यशगान।
ग्रंथों में अंकित सभी, पूजन,विधी-विधान।।
विहँस उठी माटी तभी, फूट पड़े उदगार।
बच्चों में क्यों कर हुआ, अहं भाव संचार।।
मेरी ममता के जने, दीपक, तेल, कपास।
उड़ा रहे हैं देख लो , अपनों का परिहास।।
गर्मी, वर्षा, शीत को, झेल-झेल दिन-रात।
वसुधा जग को दे रही, जीने की सौगात।।
तुम भी अपने नेह का, करो खूब विस्तार।
जीवन भर हरते रहो, जगती का अंधियार।।
बाती कहती गर्व से, मैं लाई उजियार।।
मेरे दम पर जगत में, फैला हुआ प्रकाश।
रात-रात भर तमस का, मैंने किया विनाश।।
सूत-सूत में है भरी,जीवन शक्ति अपार।
एक अकेली देह ने, जीत लिया संसार।।
दीप्तित लौ को देखकर, सहमा है अंधियार।
इसी-लिए उजियार पर, अब मेरा अधिकार।।
तत्पर होकर तेल ने, उड़ा दिया उपहास।
घोर तिमिर से युद्ध कर, मैंने किया उजास।।
तम की भेदी तेल ने, घुप्प स्याह दीवार।
तब जाकर उजियार ने,लिया आज अवतार।।
नेह दिया है तेल ने, सांस-सांस में प्राण।
उसके उर-उत्सर्ग का, रीता दिया प्रमाण।।
पल पल सींची वर्तिका, तन मन हुआ विलीन।
तभी भगी है कालिमा, होकर सत्ताहीन।।
अहम देखकर तेल का, बाती का गुणगान।
दीप भला क्यों चुप रहे, करने लगा बखान।।
मौनभंग कर दीप ने, किया प्रखर प्रतिवाद।
घोर अमा से बहस का, पलपल मुझको याद।।
क्षीण-काय है वर्तिका, कर्पूरी है तेल।
मुझ दीपक के पाहुने, मुझसे खेलें खेल।।
सदियों से जग में हुआ, मेरा ही यशगान।
ग्रंथों में अंकित सभी, पूजन,विधी-विधान।।
विहँस उठी माटी तभी, फूट पड़े उदगार।
बच्चों में क्यों कर हुआ, अहं भाव संचार।।
मेरी ममता के जने, दीपक, तेल, कपास।
उड़ा रहे हैं देख लो , अपनों का परिहास।।
गर्मी, वर्षा, शीत को, झेल-झेल दिन-रात।
वसुधा जग को दे रही, जीने की सौगात।।
तुम भी अपने नेह का, करो खूब विस्तार।
जीवन भर हरते रहो, जगती का अंधियार।।
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