11 नवंबर 2012

धुआँ छुपा है दीप में

जिसका दिल पत्थर हुआ, जीवन अंधी रात
उसको क्या रोशन करे, दीपों की सौगात

आँगन,चौखट,देहली, तुलसी,ताक,मुँडेर
नेह सम्पदा बाँटता, दीपक महा कुबेर

लाख दिये करते नहीं, रोशन घर-संसार
अगर चली है वक्त की, धारदार तलवार

मंथर गति से जल रहा, एक अकेला दीप
अँधियारा भयभीत है, जाता नहीं समीप

उसे प्रभावित क्या करे, दीपों भरी कतार
जिसके सपने टूटकर, बिखर गए हरबार

धुआँ छुपा है दीप में, चंदा में है दाग
तू भी गाना बंदकर दुखियारों के राग

सदियों से जलता रहा, निभा-निभा कर्तव्य
दिया सिखाता है यही, भावी कर अतिभव्य

पाँवों में रौंदा गया, ढला चाक पर घूम
तपन सही है देह ने, तभी दीप की धूम

कबिरा, मीरा, सूर के, आज परखिए बोल
सत्य, नीति, आदर्श  के, दीप बने अनमोल

मानस, गीता, बाइबिल, या गुरुग्रंथ, कुरान
लाख दियों की रोशनी, भरा पड़ा सद्ज्ञान

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