सत्यकर्म, सद्भावना, जीवदया संसार
यही पताका दीप ने, फहराई हर बार
दूर क्षितिज पर जब हुई, अरुणोदय की रेख
विहँस उठी तब वर्तिका, कर्मों का फल देख
बुझकर दीपक ने दिया, अपशकुनी संकेत
जीवन नदिया बह चली, ज्यों मुट्ठी में रेत
आँखों से दिल ने कहा, दीपक को पहचान
रजनी का मार्तण्ड ये, वह दिन का दिनमान
शाम हुई रोशन हुए, आँगन चौखट द्वार
तम से लड़ने के लिए, सैनिक हैं तैयार
अँधियारे ने सत्य से, किये कई अनुबंध
न्यायालय में खा रहे, गीता की सौगंध
धर्म-कर्म यज्ञादि या, पूजन-पाठ विधान
दीप जलाकर ही मनुज, चढ़े नए सोपान
महिमा है उस दीप की, जलता रहे अखंड
दर्शन भर से मिट रहे, जन्म-जन्म के दंड
महिमा अखण्ड दीप की, जान रहा संसार
कठिन कार्य को सरलतम, कर देते करतार
धुआँ उठे धृतदीप से, ढले थाल की कोर
लल्ला के गालों लगे, रोज चँदोला भोर
यही पताका दीप ने, फहराई हर बार
दूर क्षितिज पर जब हुई, अरुणोदय की रेख
विहँस उठी तब वर्तिका, कर्मों का फल देख
बुझकर दीपक ने दिया, अपशकुनी संकेत
जीवन नदिया बह चली, ज्यों मुट्ठी में रेत
आँखों से दिल ने कहा, दीपक को पहचान
रजनी का मार्तण्ड ये, वह दिन का दिनमान
शाम हुई रोशन हुए, आँगन चौखट द्वार
तम से लड़ने के लिए, सैनिक हैं तैयार
अँधियारे ने सत्य से, किये कई अनुबंध
न्यायालय में खा रहे, गीता की सौगंध
धर्म-कर्म यज्ञादि या, पूजन-पाठ विधान
दीप जलाकर ही मनुज, चढ़े नए सोपान
महिमा है उस दीप की, जलता रहे अखंड
दर्शन भर से मिट रहे, जन्म-जन्म के दंड
महिमा अखण्ड दीप की, जान रहा संसार
कठिन कार्य को सरलतम, कर देते करतार
धुआँ उठे धृतदीप से, ढले थाल की कोर
लल्ला के गालों लगे, रोज चँदोला भोर
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