मावस ने छलछिद्र कर रहन रखा कुछ अंश
तभी दीप के पाँव में, अँधियारे का वंश
सम्मुख रखकर दीप को, देखो एक निगाह
वैचारिक एकाग्रता, लाती नया प्रवाह
दिया-सलाई ने किया, दीपशिखा से प्यार
फैल गई तब रोशनी, झिलमिल वृत्ताकार
हृदय जला है दीप का, भस्म हुए अरमान
फिर भी है प्रतिबद्ध वह, देने को बलिदान
तिलतिल जलकर दीप ने, नाप लिया आकाश
जीवन भर ढोता रहा, अँधियारे की लाश
दीप-दान बहकर गया, गंगा के उस पार
खुशियाँ मन की हो गईं, जैसे कई हज़ार
दीपक, गंगा-आरती, हर-द्वार का घाट
मानो उजले हो गए, मैले हृदय कपाट
माटी का इक दीप जब, बने स्वयं चैतन्य
देख-देखकर सृष्टि ने , कहा दीप तू धन्य
समझ गया है दीप अब, प्राची की मुस्कान
लौट गई है यामिनी, समय बड़ा गतिमान
ज्योति जलाकर छंद की, निभा रहे जो प्रीत
उनके दिल में प्रेम की, कमी न आई मीत
तभी दीप के पाँव में, अँधियारे का वंश
सम्मुख रखकर दीप को, देखो एक निगाह
वैचारिक एकाग्रता, लाती नया प्रवाह
दिया-सलाई ने किया, दीपशिखा से प्यार
फैल गई तब रोशनी, झिलमिल वृत्ताकार
हृदय जला है दीप का, भस्म हुए अरमान
फिर भी है प्रतिबद्ध वह, देने को बलिदान
तिलतिल जलकर दीप ने, नाप लिया आकाश
जीवन भर ढोता रहा, अँधियारे की लाश
दीप-दान बहकर गया, गंगा के उस पार
खुशियाँ मन की हो गईं, जैसे कई हज़ार
दीपक, गंगा-आरती, हर-द्वार का घाट
मानो उजले हो गए, मैले हृदय कपाट
माटी का इक दीप जब, बने स्वयं चैतन्य
देख-देखकर सृष्टि ने , कहा दीप तू धन्य
समझ गया है दीप अब, प्राची की मुस्कान
लौट गई है यामिनी, समय बड़ा गतिमान
ज्योति जलाकर छंद की, निभा रहे जो प्रीत
उनके दिल में प्रेम की, कमी न आई मीत
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