27 अक्टूबर 2012

दीप जला,कुंमकुंम लगा

सीना फूला गर्व से, अम्बर हुआ निहाल
धरती के इक दीप ने, ऐसा किया कमाल

दो भागों में बाँटती, आँगन की दीवार
माँ ने दीपक धर दिया, खुशियाँ हुईं हजार

अंधियारे ने कर लिया, नभ से वादविवाद
दीपक ने हर पल कहा,  'याद  रहे  मर्याद'

पत्थर दिल पिघला नहीं, समझ न पाया घात
मोम-दीप की आँख से, नदी बही जिस रात

दीप  जले  जब मंच पर, खूब बहे आनंद  
दोहा, कविता, गीत सब, बरसाते  मकरंद 

यूँ तो जग में यज्ञ के, होते कई प्रकार
दीप-यज्ञ से पाइए, परलोकी उजियार

धुआँ-जलन पीकर करे, जग में दीप उजास
तभी लिखा है लोक ने, गौरवमय इतिहास

सबके अंदर सत्य का, धकधक करे प्रकाश
फिर भी दुनिया कर रही, बाहर उसे तलाश 

दीप जला,कुंमकुंम लगा, ले हाथों में थाल
प्रिया कहे प्रस्थान  को, सरहद  है  बेहाल

प्राण-पखेरू उड़ चले, लेकर मन में आस
दीप जलाने के लिए, बचा न कोई पास

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