25 अक्टूबर 2012

लोकतंत्र के दीप को

दीप बुझाने से कभी, खुशियाँ मिलती यार
ऐसी उलटी रीत का,क्या स्वागत-सत्कार

अधिक समय रहता नहीं, अँधियारे का राज
जन-मन के आलोक ने, बदले कई समाज

भ्रष्टतंत्र की बात जब, पड़ी दीप के कान
अचरज से उसने कहा, ‘मेरा देश महान’

नई रोशनी चाहता, सिंहासन का पाट
संभव है पैदा करे, अंधियारे की काट

सबकी नीयत एक-सी, क्या दिल्ली भोपाल
जमा करो बस  बैंक में , अंधियारे का माल

अँधकार से लिप्त हैं, सत्ता के गलियार
अब तो होना चाहिए, दीप किरण के वार

लोकतंत्र के दीप को, फाइल का आघात
फाइल से फाइल करे, रुपयों की बरसात

आँखों का दीपक बने, करे रोशनी दान
पुण्यकर्म सबसे बड़ा, यही ग्रंथ का ज्ञान

दीप-दान से है बड़ा, आँखों का ही दान
दृष्टिहीन करता फिरे, अपने पर अभिमान

कैसे काटे आदमी, दुख की अंधी रात
भूख-गरीबी लीलती, साँसें और प्रभात

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