22 अक्टूबर 2012

लोकतंत्र आया मगर

चूल्हे को दी दीप ने, थोड़ी आग उधार
माँ ने सेंकी रोटियाँ, मिला-मिलाकर प्यार

दीपक से भयभीत हो, भागी तम की रात
निंदिया, काजल, कोयला, सबको दी सौगात 

नभ की है जो संपदा, धरती का अधिकार
दिल में रखकर दीप ने, पाला वह उजियार

बाँट रहा वह रोशनी, झेल रहा वह श्राप
मोम-दीप के पाँव से, दर्द बहा  चुपचाप

इकलौता बेटा मरा, घर का बुझा चिराग
कुलदीपक को डस गया, जैसे तक्षक नाग

राम नाम मणि दीप धर, तुलसी करे तलाश
आप प्रकाशित हो गए, जग में किया प्रकाश

नगर अयोध्या दीप से,जगमग औ' खुशहाल
बचे रहे  श्री राम के,  मन में कई सवाल  

माचिस में वह कैद है, मूक-बधिर चुपचाप
जबतक हुआ न दीप से, उसका मेल-मिलाप

सत्ता हो चाणक्य-सी, जले नीति का तेल
संभव है तब मिट सके, घोटालों के खेल

लोकतंत्र आया मगर, जनमन अभी उदास
उजियारा सीमित रहा, धनकुबेर के पास

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