12 अक्टूबर 2012

दीप धरे दीवार पर

लछमी, दुर्गा, शारदा, गणपति और महेश
युगों-युगों से दीप का, आराधक ये देश

सत्ता काली कोठरी, लगे सभी पर दाग
रिश्ता है अंधियार से,  फिरभी है अनुराग

आँख न सूझे आँख को, घोर अँधेरी रात
ऐसे में दीपक कहे,‘तम की क्या औकात’

दीप धरे दीवार पर, भरे सुनयना साँस
प्रियतम हैं परदेस में, चुभी हृदय में फाँस

कृष्ण दीप की रोशनी, राम दीप के प्राण
अंतस के उजियार का, करते नवनिर्माण

नन्हा दीपक जूझता, लड़ता सारी रात
जाता है अँधियार तब, आता नया प्रभात

पले रात की कोख में, झूठ-कपट अपराध
दिवस दिलासा सत्य की, लम्बी जीवन साध

दीपक ने हरपल दिया, छोटा एक बयान
कर्मों के आधार पर, यहाँ बना  पहचान

मावस नभ में ठोंकती, अँधियारे की कील
तभी दीप लेकर चला, सपनों की कंदील

झिलमिल,झिलमिल रोशनी,पाकर खुली जमीन
धरती पर बिछती गई, सतरंगी कालीन

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