30 अगस्त 2011

नदियाँ जीवनदायिनी

जल संकट के दौर में, पर्यावरण सुधार
उपकृत खुद हो जाइये, देकर ये उपहार

सागर-सा गंभीर हो, नदियों-सा गतिमान
जल जैसा निर्मल रहे, ऐसा व्यक्ति महान

सागर से बादल उठा, पहुंचा देश-विदेश
घटा मचलकर कह रही, बदलेगा परिवेश

पानी, हीरा, कोयला, तेल,खनिज भण्डार
पुण्यकर्म फल रूप में, धरती के उपहार

सूखी है जल सम्पदा, सबकुछ देकर दान
कंकर - पत्थर रेत ही, नदिया का सामान

निराकार के रूप की, महिमा ले पहचान
गंगा, जमुना, नर्मदा,सरल-तरल भगवान

धरती माँ का रूप है, ये जाने संसार
लेकिन उससे दो गुना,जल का है आकार

नदियाँ जीवनदायिनी, धरती पर वरदान
इनको दूषित कर रहा, तू कैसा इंसान

प्यास बुझाने के लिए, लोग करें उपकार
लेकिन अब जल स्त्रोत पर, बैठे पहरेदार

विश्व विजय-सा देखिए, चमकेगा विश्वास
प्याऊ पर जिसको मिला, पानी एक गिलास

सौ तीरथ के पुण्य को, जहाँ बँटोरे हाथ
उसी धरा पर हो गए, प्याऊ आज अनाथ

भरा-भरा था आसमां, उलट गई अब चाल
ताल- तलैया क्या कहें, सूख गया पाताल

पंचतत्व से है बना, जग में अधम शरीर
उसके ही जलतत्व की, कभी न समझी पीर

जल से जीवन चल रहा, जीव-जंतु आवास
जल की रक्षा के बिना, भक्षक सभी विकास

पुल-पुलिया, सड़कें बनीं, हुए नये निर्माण
लगा संतुलन दाँव पर, ले वृक्षों की प्राण

रूठे हैं जलस्त्रोत सब, माँग रहे हैं न्याय
खोज रहा पर्याय अब, वैज्ञानिक समुदाय

आज न चेते हम अगर, बैठे आँखें मूँद
तरसेंगी फिर पीढ़ियाँ, पाने को जल बूँद

छाती छेदी भूमि की, छेद दिया पाताल
कहाँ गया पानी भला, मन में यही सवाल

रहिमन तुम सच्ची कहो, ‘बिन पानी सब सून’
मन में उठते भाव ज्यों, तन में बहता खून

सुधा कहा संसार ने, मगर किया अपमान
जल से जीवन जोड़कर, परखो ये विज्ञान

दूषित है पर्यावरण, अपव्यय है भरपूर
नई सदी के स्वप्न यूँ, होते चकनाचूर

बोरवेल घायल हुए, कुएँ, बावड़ी, ताल
निर्वसना सरिता हुईं, सिंधु स्वयं बेहाल

रुपयों में तुलने लगी, जब कण्ठों की प्यास
जननी के जलस्त्रोत तब, रहने लगे उदास

डगडग रोटी अब नहीं, और न पगपग नीर
कुए - बावड़ी बन गए, बाँटल की तकदीर

बड़े बाँध का मोह जब, नदी कर चुकी भंग
लघु बाँधों से जीतिए, जल-संकट की जंग

"धरती के उपहार" पृष्ठ २३ से

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