मैं लिखता कुछ भी नहीं, लिखवाते हो आप
मिलते हैं आदेश भी, मौन और चुपचाप
दोहे हैं सब आपके, मेरा है बस नाम
लिखकर मैंने रख दिये, जीवन के संग्राम
वरदहस्त है आपका, यही कृपा है नेक
फिर चाहे संसार में, बाधक बनें अनेक
मैंने चाहा रात-दिन, भजूँ तुम्हारा नाम
जग ही पानी फेरता, झंझट किए तामाम
मैं तेरे सम्बन्ध में, बनता हूँ वाचाल
तूने मन-मस्तिष्क में, अद्भुत भरे सवाल
तुम अनाथ के नाथ हो, पाहन के प्रभु राम
कृपा करो करुणाकरण, कविता बने ललाम
घट-घटवासी आपका, हर घटना में हाथ
बिना आपके कब घटे, कुछ भी दीनानाथ
मिला पात्रता से अधिक, मुझे मान -सम्मान
मुश्किल है प्रभु आपकी, करुणा का गुणगान
रोड़ा बनूँ न राह का, करूँ न सपना भंग
मन में है यह कामना, जीवन बने प्रसंग
जनम,परण के सुख सभी, और मरण की पीर
जग में विधि के हाथ की, खींची गई लकीर
क्लेश-शोक-संताप में, जब तेरा गुणगान
सुख में भी तुझको भजूँ, ऐसा दे वरदान
तेरी महिमा अकथ है, रूप अनादि-अनंत
अपनी-अपनी दृष्टियाँ, योगी, भोगी, संत
ऐसा मुझे मिला नहीं, कोई दूजा ठौर
जहाँ बसे हों तुम नहीं, और बसा हो और
हर संकट से आपने, मुझको लिया उबार
नैया प्रभु इस बार भी, लगा दीजिए पार
सद्ग्रंथों में है लिखा, यही सृष्टि का मूल
है अधीन जिसके जगत, कर उसको अनुकूल
सभी चाबियाँ सौंपकर, सबको दे वरदान
एक मगर देता नहीं, दाता सजग सुजान
जीवन का आनन्द है, सिर पर प्रभु का हाथ
परछाई भी छोड़ती , वरना जग में साथ
अधिक धनी, कुछ आदमी, बहुत यहाँ कंगाल
ईश्वर के इस न्याय पर, जग में उठे सवाल
फल मिलता विश्वास का, कृपा करें यदुनाथ
द्रुपदसुता की लाज या, सूरदास का हाथ
धरती पर धनधान्य से, भरे खेत-खलिहान
निराकार के रूप की, माया अद्भुत जान
सच्चों को दुख -दर्द दो, झूठों को आराम
फिर भी दुनिया कर रही, दाता तुम्हें प्रणाम
धनवालों को धन मिले, निर्धन रहे गरीब
कैसा तेरा न्याय प्रभु!, कैसी ये तरकीब
गाँव-शहर में सब जगह, बने हुए प्रभुधाम
फिर भी जग में हो रहे, उलटे-सीधे काम
जो तुमको भजता नहीं, उसको अपरम्पार
दीन-हीन हैं भक्तजन, दुर्बल औ’ लाचार
युग बदले, प्रभु! आपने, बदले नहीं विकार
सादा जीवन रो रहा, रोयें उच्च विचार
'धरती के उपहार' पृष्ठ १९ से
24 अगस्त 2011
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