10 अक्टूबर 2012

दीपक की अंतर्व्यथा

अद्भुत किस्सा प्रेम का, है विचित्र अभियान
मरे पतंगा दीप पर, या दीपक दे जान

ऊषा ने सुनकर कहा, भीषण ये संघर्ष
जग मानेगा दीप के, जीवन का उत्कर्ष

हर संकट का हल यहाँ, मिलाजुला विश्वास
जैसे काटे कालिमा, माटी-तेल-कपास

माटी सहती है जलन, धुआँ सहे आकाश
तेल त्यागता देह को, तम का तभी विनाश

लाख दिलाई दीप ने, संध्या को सौगंध
लेकिन पूनम ने किया, मावस से अनुबंध

झूठ-कपट है कालिमा,सत्य-न्याय उजियार
महँगाई की मार से, बुझा दीप हर बार

मावस के हाथों पड़ी, जब सूरज की शाम
दीप छुड़ाने को चला, उसे कहाँ विश्राम

दौड़-दौड़कर अनवरत, थका न नन्हा दीप
धन्यवाद  कहने लगी , आकर सुबह  समीप

जगमग दीपक रोशनी, ढ्योढी,आँगन, ताक
जिनके घर अँधियार है, उनके सपने ख़ाक

दीपक की अंतर्व्यथा, है दुख का भंडार
दुबली पतली देह में, आह-दाह-अंगार

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