बहुतायत में हो गया, देन-लेन का काम।
लेन- देन के फेर में, भूल गए अंजाम।।
खरी कमाई के लिए, कष्टों के अम्बार।
आसानी से हो रहे, ग़लत-सलत व्यापार॥
शिखर पुरूष पर लग गए,लाछन औ' आरोप।
अख़बारों के सामने, नतमस्तक है तोप॥
उनकी किस्मत में लिखे, प्रबल सम्पदा योग।
जांच करा कर देख लो, बैठा लो आयोग॥
भौतिक सुख की चाह में, होड़ करें सब लोग।
गिरते नैतिक- मूल्य के, करते नए प्रयोग॥
सत्य विसर्जित हो रहा,दिन-दिन सुबहो-शाम।
सिंहासन पर झूठ ही, आज करे आराम॥
सदइच्छा, सदभाव का, जब से पड़ा अकाल।
बढ़ी, बड़ों की सूर्खियाँ, हुए गुलाबी गाल॥
ज़िंदा- मुर्दा आदमी, दोनों एक समान।
जिसने बेची आत्मा, उसकी क्या पहचान॥
दुविधा है इस वक्त की, जिसका नहीं इला़ज।
पैसे ही ने लूट ली, नैतिकता की लाज॥
सुख के बदले अर्थ अब, बनी सम्पदा साध्य।
साधन की शुचिता नहीं, पैसा है आराध्य॥
स्त्रोत- पुस्तक 'झुकता है आकाश' से ।
7 मई 2009
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