3 जून 2009

सपने सच्चे भोर के

सपने सच होते नहीं ,सब जाने ये बात।
परछाई को घेरने , भाग रहे दिन-रात॥

पत्थर पर कारीगरी, सपना ले आकार।
कृपा ईश की चाहिए, काम करें औजा़र॥

ये आवश्यक तो नहीं, हो जाएँ साकार।
लेकिन सपने देखना, आँखों का अधिकार॥

सपने सच्चे भोर के, लिए यही विश्वास।
आँखों ने देखा उन्हें, भर-भरकर उल्लास॥

कर्मों के आधार पर, अपनी चादर तान।
सपने ख़ुद बुनते नहीं, सच होने का ज्ञान॥

ऐसे सपने देखने, में कैसा नुकसान।
सहज-सुलभ करवाए जो, रत्नजड़ित परिधान॥

झूठा सपना देख मत, मत पढ़ ग़लत किताब।
ख़ुद को ही देना पड़े, जिसके लिए ज़वाब॥

चील सरीखा हौसला, बगुले जैसा ध्यान।
सपनों के अरमान को, देते हैं सम्मान॥

कैसे सोचे आदमी, बंगला मोटर -कार।
रोटी में जो बुन रहा, सपनों का संसार॥

टूटे सपने पर नहीं, टूटी मन की आस।
करी प्रतिज्ञा इस तरह, रच डाला इतिहास॥

सपने पलते आँख में, ह्रदय बसे अरमान।
कर्मवीर के हाथ में, यश देता भगवान॥

हंगामे की बात क्या, काम करो चुपचाप।
सपनों में आकाश की, ऊँचाई लो नाप॥

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