1 मई 2009

पलकें नम माँ-बाप की

समझ बहू की खो गई, बेटा है मजबूर।
चमक उड़ी घर-बार की, जैसे उड़े कपूर॥

दोष बहू का है कहाँ , बेटा अपना खून ।
इस कलयुग की देन है, निजता, द्वैष, जुनून॥

सास सहज सहती रही, व्यंग बहू के बाण।
ससुर मौन देखा किए, खिंचती हुई कृपाण॥

ऊँचे सपनों ने बुने, स्वच्छंदी अलगाव।
टूटे घर-परिवार सब, रिसते मन के घाव ॥

पलकें नम माँ-बाप की, कटे न घर की नाक।
बेटे से बोले बहू , दे दो अभी तलाक॥

रास उसे आया नहीं ,मिला-जुला परिवार।
सुख-वैभव संसार में, खींच रही तलवार॥

बहू चाहती है सदा , मिले नेक व्यवहार।
बिना किए ही स्वयं का, किंचित मात्र सुधार॥

अलग हुए बेटे - बहू, बिना किसी उत्पात।
श्रवण गया माँ-बाप का, गया लखन का तात॥

बहू गई बेटे सहित, छोड़ गई अवसाद।
करते है माँ-बाप अब, आँसू में संवाद॥

सौ-सौ संकट दे दिए, बेटे ने घर छोड़।
कंधा तोड़ा बाप का, भुजा अनुज की तोड़॥

राखी फीकी हो गई, बहना हुई उदास।
हरे-भरे परिवार में,लगा ग्रहण खग्रास॥

ममता ने पत्थर रखे, पिए खून के घूँट।
बेटा जब घर से गया, आँसू निकले फूट॥

हठधर्मी बनकर बहू, बाँट रही संत्रास।
भाड़े के घर में कटे, बेटे का वनवास॥

स्त्रोत - 'मेकलसुता' पत्रिका, जनवरी-मार्च२००९ ,पृष्ट १७।

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