चार वेद इक ओर हैं , दूजी तरफ़ पुरान।
मानस, गीता से 'प्रभू', ऊँचा माँ का मान।।
माँ को देखा जब कभी, मैंने बहुत उदास।
जग का वैभव यूँ लगा, जैसे सब बकवास॥
माँ की तबियत पूछकर, मुझको है आराम।
जैसे मैंने पुण्य का, कर डाला कुछ काम॥
माँ की महिमा है बहुत, अतुलनीय अनमोल।
नहीं तराज़ू एक भी, जो कर पाए तौल॥
इक पहलू में रख दिया, जग का सारा ज्ञान।
माँ रख्खी दूजी तरफ़, निकली वही महान॥
बूढ़ी माँ की आँख में, आँसू के अम्बार।
सूख गए टपके नहीं ,कितनी हिम्मतदार॥
माँ ममता की मूर्ति है, वात्सल्य की खान।
माँ के आँचल में छुपे, गीता- वेद- पुरान॥
शीतल मंद बयार है, सुख सागर का रूप।
हरे नीम की छाँव- सी, माँ जाडे़ की धूप॥
सभी ऋणों का कर चुका, यथासमय भुगतान।
लेकिन होता मातृ-ऋण,जग में अधिक महान॥
आंखों से खुशियाँ झरीं, कही ह्रदय की बात।
बेटे ने जब रख दिया, वेतन माँ के हाथ॥
स्त्रोत- 'प्रयास' पत्रिका , अप्रैल- जून २००३, पृष्ट १९।
30 अप्रैल 2009
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