उस दम्पत्ति की दो ही बेटियाँ हैं। पति-पत्नी ने बेटे समझकर लालन -पालन किया। लोग कहते हैं 'आज के जमाने में बेटियाँ ,बेटों से बढ़कर होतीं हैं।' इसीलिए दोनों ईश्वर के प्रति सदैव कृतज्ञता ज्ञापित करते रहे कि 'बेटे न हुए, न सही, भगवान ने बेटियाँ तो दी हैं। ' और जीवन के इन्द्रधनुषीय रंगों का आनंद लेते रहे। जब कभी कोई शब्दबाण मारता , तो बातों ही बातों में ईष्ट- मित्रों, परिजनों को कहते - रहते 'हमारी दो बेटियाँ चार बेटों के बराबर हैं' और गर्व से सीना तानकर मस्तक ऊँचा रखते।
पिता का बेटियों के प्रति अनुराग , व्यस्त दिनचर्या और परिश्रमी मन बेटियों को कुछ करने का हौसला देता। माँ की असीम अपेक्षाये, धार्मिक प्रवत्ति व ममता के मोल ने बेटियों को वे संस्कार दिए, जिनकी बच्चे अपेक्षा करते हैं। कहा जाता हैं 'बेटियों की उम्र में पंख होते हैं। ' बचपन कब बीता व बेटियाँ किशोरियाँ कब हो गईं पता ही नहीं चला।माता-पिता ने ममता का मोह त्यागकर दोनों बेटियों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु बड़े शहर भेज दिया।
एक दिन असमय अशुभ घटित हुआ। काल की कुल्हाड़ी चल पड़ी व पिता 'कोमा' में चले गए। लाख प्रयास के बाद भी होनी टली नहीं और डाक्टरों ने जवाब दे दिया। लेकिन बेटियों ने हिम्मत नहीं हारी। पापा की इच्छाओं के अनुरूप लक्ष्य पर संधान कराती रहीं। कहते हैं 'फल मिलता विश्वास का कृपा करें रघुनाथ।'
बड़ी बेटी ने पढ़ाई पूर्ण की व अच्छी जगह प्लेसमेंट भी हो गया। तीन साल बाद , आज वह पहला वेतन लेकर घर आई है। खुशी-खुशी जब बेटी ने सैलेरी चेक माँ की अंजुरी में रखा , तो आंखों से खुशियाँ बरसने लगीं। आँचल गिला हो गया । 'आज तेरे पापा होते ' ........................कहते- कहते माँ बेसुध हो गई।
स्त्रोत- दैनिक जागरण
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें