19 अप्रैल 2009

मन के अश्व हजार हैं

मन भेदों से बढ़ गए, अब एकल परिवार।
मन तोड़े घर- बार को , मन जोड़े संसार॥

मन ठोकर तब मारता, जब समझे निहितार्थ।
मन के कारण वन चले , राजा थे सिध्दार्थ॥

मन मतंग माने नहीं , करे आचरण भ्रष्ट।
इसीलिए पैदा हुए , भांति- भांति के कष्ट॥

मन व्याकुल क्यों हो रहा, बैशाखी को देख।
जग में बांचे आदमी, लिखे हुए आलेख॥

मन के अश्व हजार हैं, तन का रथ हैं एक।
नश्वर तन पर हैं मगर, तृष्णा चढीं अनेक॥

मन करता है आंकलन , जीत- हार के बीच।
भले- बुरे सब कर्म का, प्रतिफल रहा उलीच॥

मन की ही एकाग्रता, करती है संवाद।
रब का हो संसर्ग तो, छूटें सभी विवाद॥

मन ही जब मैला रहा, तब क्या व्रत-उपवास।
व्यर्थ सभी प्रक्षालना , तीरथ और प्रवास॥

मन चंचल ,मन चपल है, मन है चाटूकार।
मन जैसा दूजा नहीं, जग में आविष्कार॥

मन मीरा का जब लगा, तन-मन हुए अधीन।
गरल, सुधामय हो गया, हुईं कृष्ण में लीन॥

मन की कसकर खींच लो , ढी़ली पड़ी लगाम।
वरना मन में है रमा, दाम, काम औ' नाम॥

मन इतना गतिशील है, होता नहीं यकीन।
पल में राजा वह बने, क्षण में होवे दीन॥

स्त्रोत- 'वीणा' पत्रिका अप्रैल २००९ पृष्ट 32

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