पाल रखा है दुख का सागर ।
भूल गए हैं सुख की गागर ॥
चाहत ज़्यादा आवक कम हैं ।
इसी बात का सबको ग़म हैं ॥
उसकी खुशियाँ दुगनी क्यों हैं ।
ऐसा रहता हमको भ्रम है ॥
पाँव बड़े हैं, छोटी चादर ।
पाल रखा है दुख का सागर ।
युग ने सबकी, भूख बढ़ाई ।
इच्छाओं को , खूब जगाई ॥
लड़नी होगी, अपनी-अपनी,
चंचल मन से मूक लड़ाई ॥
भरा नहीं मन इतना पाकर ।
पाल रखा है दुख का सागर ।
कुटियाओं को बंगले भाते ।
बड़े उजाले खूब सजाते ॥
महानगर में कौन सुखी है ?
सबसे पूछा नहीं बताते ॥
कृपा करो हम पर नटनागर ।
पाल रखा है दुख का सागर ।
17 अप्रैल 2009
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