फूलों से लेते रहे , हम शोलों का काम।
अपना घर जल जायगा, भूले ये अंजाम॥
लहू-लहू है आत्मा, खुशियाँ पड़ीं अचेत।
आप बतायें हैं यही ,क्या जीवन संकेत॥
'पापी' किस्मत का धनी, फ़िर बच निकला यार।
पुल भी टूटा हाय कब, निकल गई जब कार॥
फूलों के संसर्ग ने, छोड़ा नहीं प्रभाव।
कांटे थे कांटे रहे, बदला नहीं स्वभाव॥
उतरा हो जब आँख में, किसी शख्स के खून।
उस लम्हें का नाम ही , रख्खा गया जुनून॥
सकते में संसार है, साहस को दी मात।
महाशक्ति को दे गया, शक्तिहीन आघात॥
ख़ुद के घर में जब लगी, ये आतंकी आग।
फन फैलाये डोलता, ज्यों गुस्साया नाग॥
उसने तो दिखला दिया, आतंकी उन्माद।
हम बस करते ही रहे, फिल्मों- से संवाद॥
शब्दब्रह्म के सत्य को, देखा गया टटोल।
घटना अक्षरधाम की, करती डांवाडोल॥
स्त्रोत- 'वीणा' पत्रिका जनवरी २००९ पृष्ट 36
7 अप्रैल 2009
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बहुत ही बढिया रचना है जी
जवाब देंहटाएंसुन्दर दोहे हैं...........सार्थक लिखा है
जवाब देंहटाएंचलिए मेरी तरफ से भी एक तुकबंदी-
जवाब देंहटाएंलगता है तकदीर भी आतंकी के हाथ।
सरकारी सहयोग भी छुपकर उनके साथ।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
kya bat hai janab, narayan narayan
जवाब देंहटाएंब्लॉग जगत में और चिठ्ठी चर्चा में आपका स्वागत है . आज आपके ब्लॉग की चर्चा समयचक्र में ..
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छा लिखा है . मेरा भी साईट देखे और टिप्पणी दे
जवाब देंहटाएंBhai Prabhu ji,
जवाब देंहटाएंAchchhe dohe likhe hain. Padkar maza aagaya.Badhai.
phoolon ke sansarg ne chhoda nahin prabhav.
kante the kante rahe badla nahin swabhav.
punah badhai.
Chandrabhan Bhardwaj