5 अप्रैल 2009

शब्दों का संसार है

सहे नहीं जिसने कभी, शब्दों के आघात।
इज्जत,मान-अपमान का,क्या समझे अनुपात॥

खेल बड़ा गंभीर है, शब्दों का श्रीमान।
शब्दों ही से देवता, हो जाते पाषाण॥

शब्द सभी मृतप्राय हैं, प्रेम,त्याग-बलिदान।
नई पौध को दे प्रभू, सही अर्थ परिधान॥

मरहम जैसे शब्द हैं, शब्द चुभोते तीर।
प्रेम, दया, सद्भावना, शब्दों की तासीर॥

शब्दों का संसार है, शब्दों में सदभाव।
कथा ,कहानी ,गीत का,जग में महा प्रभाव॥

शब्द किताबों में भरे, शब्द बोलते लोग।
हर भाषा में हो रहे , नितप्रति नए प्रयोग॥

शब्दों से भाषण बना, नेता का आधार।
काम मगर आया नहीं, था तो लच्छेदार॥

शब्दब्रह्म है जानकर, कहते तुलसीदास।
अलख जगी संसार में, ऐसी भरी मिठास॥

कहना,सुनना,बोलना, शब्दों के सम्बन्ध।
शब्दों से ही हो रहे, जग के सब अनुबंध॥

अर्थ बदलकर शब्द के, शब्द हुए बीमार।
शब्दों की हिंसा हुई, घायल भी दो - चार॥







कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें