विधि ने भी कैसा रचा , राखी का त्योहार॥
राखी के इक तार में, छिपा बहन का प्यार।
प्रीत- रीत का है प्रभू, यह अनुपम संसार॥
रेशम का धागा नहीं, और न कच्चा सूत।
पावनता के प्यार का , जग में यही सबूत॥
बहना देखे साल भर, इसी दिवस की राह।
भैया के त्योहार की , राखी बने गवाह॥
चमक रहा यूं हाथ पर, बहना का विश्वास।
मात-पिता के प्यार का,सहज-सरल अहसास॥
दीदी है कुलदीपिका, जगमग करे प्रकाश।
गहराई है अवनि-सी, स्वाभिमान आकाश॥
कुमकुम , राखी, आरती, श्रीफल औ' मिष्ठान।
सजी- धजी हैं थालियाँ, सावन की पहचान॥
गुंथी हुई हैं राखियाँ , जिनमें गुंथकर प्यार।
नेहपाश में बाँधती, दी - दी सौ - सौ बार॥
मिसरी जैसी घुल सके, खुशियों की बरसात।
हृदयवान के घर बसे, बहिना की सौगात॥
बहिना है आराधना , अद्भुत पुण्य अनूप।
प्रेमपूर्ण परिवार का, सत्यम, शिम स्वरूप॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें