26 मार्च 2009

राखी के इक तार में

बहनों का कुमकुम तिलक , भाई का मनुहार।
विधि ने भी कैसा रचा , राखी का त्योहार॥

राखी के इक तार में, छिपा बहन का प्यार।
प्रीत- रीत का है प्रभू, यह अनुपम संसार॥

रेशम का धागा नहीं, और न कच्चा सूत।
पावनता के प्यार का , जग में यही सबूत॥

बहना देखे साल भर, इसी दिवस की राह।
भैया के त्योहार की , राखी बने गवाह॥

चमक रहा यूं हाथ पर, बहना का विश्वास।
मात-पिता के प्यार का,सहज-सरल अहसास॥

दीदी है कुलदीपिका, जगमग करे प्रकाश।
गहराई है अवनि-सी, स्वाभिमान आकाश॥

कुमकुम , राखी, आरती, श्रीफल औ' मिष्ठान।
सजी- धजी हैं थालियाँ, सावन की पहचान॥

गुंथी हुई हैं राखियाँ , जिनमें गुंथकर प्यार।
नेहपाश में बाँधती, दी - दी सौ - सौ बार॥

मिसरी जैसी घुल सके, खुशियों की बरसात।
हृदयवान के घर बसे, बहिना की सौगात॥

बहिना है आराधना , अद्भुत पुण्य अनूप।
प्रेमपूर्ण परिवार का, सत्यम, शिम स्वरूप॥

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