बेटी घर की रोशनी, दोनों घर तक जाय।
अपने शील स्वभाव से, जग में यश फैलाय॥
रौनक घर की बेटियाँ , आँगन का श्रृंगार।
जगमग-जगमग कर रहा, मात-पिता का प्यार॥
बेटी घर की आबरू , आँगन की मुस्कान।
कस्तूरी मृग जिस तरह, जंगल का अभिमान॥
सजी-धजी है लाड़ली, खिली- खिली ज्यों धूप।
माँ बेटी में देखती , अपना ही प्रतिरूप॥
मात - पिता की संपदा, भाई का विश्वास।
दोनों कुल जगमग करे, बेटी स्वयम प्रकाश॥
बेटी संचित पुण्य है, जन्म- जन्म की साध।
स्वर्ग- लोक की साधना, धरती पर निर्बाध॥
बेटी धड़कन बाप की, माँ की शीतल छाँव।
घर- आँगन में सृष्टि के, क्रीड़ा करते पाँव॥
बेटी कोमल फूल - सी, लक्ष्मी का अवतार।
पशु जैसा हम कर रहे, तिस पर अत्याचार॥
हर बेटी के बाप को , ये चिंता ही खाय।
अच्छा वर मिल जाय तो, जनम सफल हो जाय॥
जोड़े बनते स्वर्ग में , तय है ईश विधान।
चिंतित फ़िर माँ-बाप क्यों, कब हो कन्यादान॥
26 मार्च 2009
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