22 मार्च 2009

गंगा अपना दर्द ये

मीठे जल को पी रहे, रत्नाकर यह जान।
खारेपन का हो कभी, नदियों से अवसान॥

आख़िर किससे जा कहे, सागर अपनी बात।
सारे जग की क्रूरता , झेल रहा दिन- रात॥

अपने जल से आजतक,बुझा न पाया प्यास।
सागर के इस दर्द का, कैसे हो आभास॥

किससे मिलने जा रही,भेष बदल कर आप।
नदिया से ये पूछते, उड़ गई बनकर भाप॥

गंगा अपना दर्द ये , कैसे रखे छुपाय।
दुनिया भर की गंदगी, घर बैठे आ जाय॥

'मिनरल-वाटर' पी गया, हर पंथी की प्यास।
प्याऊ बेचारी थकी , ले बैठी संन्यास॥

अबके होगा युध्द तो , जल होगा आधार।
शस्त्र बढ़ाने से नहीं , कुछ होगा उध्दार॥

जल संसृति का मूल है , जल से है निर्माण।
जल से जीवित जंतु सब,जल प्राणों का प्राण॥

मछली, मेढ़क, औ' मगर, सीपी, मोती, आब।
रतनाकर के उर बसे, कितने सारे ख़्वाब॥

संतों की इस बात को, खूब समझलें आप।
पानी जैसा राखिये , सबसे मेल - मिलाप॥

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