सारा जग तो कर रहा, धन - वैभव का पान।
हम क्यों जीवन - मूल्य का, ताने रहें वितान॥
हर मसले का हल मिले, हर दुःख से हो त्राण।
बात करो मिल - बैठकर, हो जाए कल्याण॥
हमसे होता ही रहा , जीवन भर प्रतिकार।
अच्छी बातों के लिए , सबसे की तकरार॥
नैतिकता सिर धुन रही , चौराहे पे आन।
धूल - धूसरित क्यों यहाँ , देवों का सम्मान॥
सारे खुश होते रहें , बना रहे व्यवहार।
एक यही है कामना , पूर्ण करे करतार॥
खाली बर्तन हो रहा , इस युग का इन्सान।
दया , धर्म, ईमान अब, शब्द कोष की शान॥
समय गवाही दे रहा , खीचे जग का ध्यान।
चरण- पादुका को मिला, सिंहासन का मान॥
नदी भरी हो नीर से, गोद भरी हो नार।
हरे- भरे हों खेत यदि , हर जीवन त्योहार॥
ज्ञान और तकनीक में, पश्चिम का सहयोग।
आदर्शों को खा रहा , जैसे क्षय का रोग॥
बुझा रहे हैं दीप जो , काट रहे हैं केक।
जन्म दिवस पर है मरा,उनका बुध्दि-विवेक॥
19 मार्च 2009
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