बेटी हूँ माँ कोंख मे , विधना का अवतार।
घर-आँगन की ज्योति हूँ, फ़िर क्यों हाहाकार॥
बिटिया आई गर्भ में , चिंतातुर माँ- बाप।
नीद उड़ाकर रात- दिन, सोच रहे हैं पाप॥
माँ जब ममता त्याग दे, बाप करे आघात।
घर को तब कैसे मिले, बिटिया की सौगात॥
माँ मुझको संसार में , भेज रहा भगवान।
विधि के रचे विधान में,व्यर्थ सभी व्यवधान॥
भिक्षा में दे दीजिये, माँ मुझको ये प्राण।
जन्मसिद्ध अधिकार माँ, सृष्टि का निर्माण॥
मुझ से रखना दूर माँ, हत्या के औजार।
वरना मेरे श्राप का, हुआ नहीं उपचार॥
माँ में नन्हीं जान हु, गर्भ काल में आज।
मुझसे सजता हे सदा, घर-परिवार समाज॥
माँ मेरी है कामना , देखूं ये संसार।
ममता का तू मोल कर,मुझ पर कर उपकार॥
सदियों से माँ शक्ति का , मुझमे है प्राधान्य।
जग के मंगल कार्य सब, मुझसे होते मान्य॥
राखी बांधू बंधू को , रोकूँ मंगल द्वार।
माँ मुझसे ना छीनिए, ये मौलिक अधिकार॥
बिंदी पर उपकार कर, कंगन पर अहसान।
मेरी सुन माँ प्रार्थना , बिटिया है वरदान॥
मैंने साधे बाप - माँ , साधा साजन द्वार।
दोनों घर को मोहते , बेटी के उदगार॥
माँ कन्या का आगमन, धरती पर अनिवार्य।
रुक जायेंगे अन्यथा , संसृति के सद्कार्य॥
पुण्य कर्म सबसे बड़ा, जग में कन्यादान।
जनम-जनम के पाप का, नाश करे भगवान॥
ऐसे मूरख व्यक्ति को , क्या संज्ञा दे आप।
जिसने कन्या जन्म ही, मान लिया अभिशाप॥
सम्भव है खुशियाँ सभी , सोचें अगली बार।
हत्यारिन इस कोख में , आना है बेकार॥
लज्जित कर मातृत्व माँ, दुःख पाओगी आप।
भूले से भी भूलना , कठिन बहुत है पाप॥
बहिना, पत्नी , बेटियाँ , इनके नहीं विकल्प।
अंकित हैं इतिहास में , गर्वित कायाकल्प॥
मातृभक्ति से हैं भरे , ग्रंथो के अध्याय।
फ़िर क्यों खोजें गर्भ में , कन्या के पर्याय॥
गर्भ गिरा के चाहतीं , पैदा हो अवतार।
ऐसी माता बाँझ सम, जनम वृथा धिक्कार॥
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