18 फ़रवरी 2009

बूढा पीपल चल बसा

दादा का बरगद मारा , पापाजी का नीम।
सड़क निकलकर कर गई, पीढ़ी तीन यतीम॥

नई सड़क पर लग गया , हत्या का आरोप।
बूढा पीपल चल बसा, बिना तमंचे - तोप॥

विस्थापित कोयल हुई , तोता - मैना मोन।
पढ़े- लिखे इन्सान को, समझायै तो कोन॥

पंछी देखो चुका रहे, चौराहों का मोल।
छैया वाले पेड़ का , बीत चुका माहोल॥

शीतल मद बयार अब, भूल जाइये यार।
धूल , धुए , दुर्गन्ध से, खूब कीजिये प्यार॥

मरनासन पीपल पड़ा, नीम करे विषपान।
लगा मनुज की बुध्दि पर, प्रश्नवाचक निशान॥

हृदयविदारकदृश्य वो, मूर्छित सभी विहंग।
बिखरे - बिखरे घोंसले , हुए बसेरे भंग॥

शाखाएँ जब चढ़ गईं , क्रूर मनुज के हाथ।
चिड़िया गिरी अलाव पर, कह कर दीनानाथ॥

वृक्ष काटने से बढी , कांक्रीट की भीड़।
बया ढूढ़ती जगह वह, जहाँ बसाये नीड़॥

चिड़िया, दाना, घोंसला, चूजे, कलरव, शाम।
सुधियों में अब हैं बचे, पीपल, बरगद, आम॥

चिंता करता स्वास्थ्य की, बेहद कड़वा नीम।
उसको काटे आदमी, जो है वैध्य - हकीम॥







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