5 फ़रवरी 2009

सूरज क्यों छुपता फिरे

सूरज की पहली किरण, भरती मन उल्लास।
कलि बदलती फूल में , जीवन में विश्वास॥

दिन भर बाँटें रौशनी, ख़ुद जलकर दे दान।
सुबह -सलोनी के लिए, डूब मरे दिनमान॥

स्वर्ण
कटोरा हाथ में, ले निकला दिनमान।
दिशा-दिशा सुख बाँटता, यही महाभियान॥

नहीं
समझ में आ रहा, अपनी ये आयाम।
सूरज क्यों छुपता फिरे, देख सुनहरी शाम॥

रीत जगत की है यही, पड़ता है जब काम।
उगते सूरज को सभी, करते सदा प्रणाम॥

जग को दर्शन दे रहा, सुबह- सुबह इकरूप।
भेद भाव को भूलकर, वितरित करता धूप॥

आलोकित आकाश में, एकमात्र भगवान।
पागल सूरज रूप में, करते हैं पहचान॥

सूर्य नमन से हैं भरे, ग्रंथो के आलेख।
अन्तर चक्षु खोल कर, बंद आँख से देख॥

अर्घ्य चढा कर सूर्य को, नितप्रति करे प्रणाम।
कार्य सभी निर्विघ्न हों, सुखद सभी परिणाम॥

स्वर्ण- कलश कर में लिए,निकल पड़ा दिनमान।
दिशा- दिशा सुख बाँटता, यही महा - अभियान॥

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