11 सितंबर 2016

अंगरक्षक 

आॅफ़िस के बाद उन्होंने कार उठाई और चलने लगे घर के लिए। श्रीमतीजी का फ़ोन आ जाने के बाद कुछ ज़रूरी फाइल्स के कारण न चाहते हुए भी देर हो गई। वैसे हर हफ़्ते ही ऐसा होता है। आज शुक्रवार था। फाइव डेज़ विक। सप्ताह का आख़िरी दिन। इसी दिन प्रायः इतना काम आ जाता है कि हर बार देर हो जाती है। मन कुढ़ने लगता है। घर-परिवार भी तो कोई चीज़ है। श्रीमतीजी को कहने का मौका मिल जाता है। घोष साहब भी सोचते हैं कि मौक़ा न दूँ। पर ऐसा हो नहीं पाता। नौकरी भी करना है। बच्चों को पालने के लिए। कायदे से तो हेडक्वार्टर पर ही रहना चाहिए। पर ऊपरवाले की मेहरबानी से सबकुछ पिछले पाँच साल से निर्विघ्न चल रहा है।

ज़्यादा देर होने के कारण आॅफ़िस के बड़े बाबू ने एक बार टोंका ‘सर ! ज़रूरी न हो, तो सुबह निकल जाइएगा। आजकल समय ख़राब चल रहा है। परसों ही इस रोड पर लूट-पाट की घटना हुई है। समाचार-पत्रों में कल डिटेल न्यूज़ भी आई थी। अपनी कार लाख ठीक चले। पर ट्रक वाले कभी डीपर नहीं देते सर। यमदूत की तरह सामने आ ही जाते हैं।’ साहब ने बड़े हल्के मूड में कह दिया...........  ‘बड़े बाबू !........... जिस दिन आ जाएगी कोई रोक नहीं पाएगा। साँसें तो ऊपरवाले की दी हुई हैं। मैं तो उसके भरोसे चलता हूँ। तुम जानते हो मेरी आदत। हमेशा अकेला ही जाता हूँ।’ हल्की-सी मुस्कान बिखेरते हुए नमस्कार किया। ड्रायविंग विंडो से हाथ हिलाया और बिदा लेकर गाड़ी स्टार्ट कर ली।

अब तक रात के ग्यारह बज चुके थे। अँधेरी रात स्याँह-स्याँह कर रही थी। आदमी को आदमी दिखाई नहीं दे रहा था। आसमान भी काले पहाड़ सरीखा हो गया। घोष साहब का घर यहाँ से पच्चतर किलोमीटर है। उन्हें करीब डेढ़ से दो घण्टा लगना है। शुरू से आदत सत्तर-अस्सी से कम की रही नहीं। वह कहते हैं इससे कम कार क्या चलाना, बैलगाड़ी चलाना होता है। लेकिन रात का सफ़र, रास्ते के मोड़ व घाटियाँ, करीब आठ किलो मीटर का पहाड़ी रास्ता। रोड की ख़स्ता हालत के कारण कार क्या आदमी दम तोड़ देता है। घोष साहब कार में अकेले व दिन भर की थकान के कारण सिर भारी होने लगा। मन में एक अज्ञात भय तो है ही। अपनी जान सबको प्यारी होती है। अचानक किसी ने सामने पत्थर रख दिए अथवा गाड़ी पंक्चर हो गई तो इस अँधेरी रात में अकेले क्या करेंगे ? इस निर्जन जंगल में कौन उनका सहायक होगा ? दुर्घटनाएँ बोम्बे-आगरा रोड पर रोज़ होती ही रहती हैं। भगवान न करे, कुछ हो गया तो पत्नी व दोनों बच्चों का क्या होगा ? बूढी़ माँ गाँव में किसके सहारे रहेगी। माँ की दवाइयाँ भी भेजना है। इस सबके बावज़ूद उनका आत्म विश्वास उतना ही दृढ़ है। निर्णय लेकर कभी पीछे नहीं हटते।

घोष साहब की कार सड़क नापती रही। विंध्याचल की पर्वत श्रेणियों से घिरा सर्पाकार घाट वाला रास्ता आ गया। एक तरफ़ ऊँचे पहाड की कटी हुई पर्वत श्रेणियांँ व दूसरी तरफ़ गहरी खाइयाँ। पिछले दस बर्षों में शायद ही कभी सरकारी विभाग ने रोड रिपेरिंग का कार्य किया हो। हाँ, रिपेरिंग के नाम पर सड़क की फाइल में काग़ज़ ज़रूर नत्थी होते रहे होंगे। अनेक जनहित याचिकाएँ भी ये गड्ढे निगल गए। इनका आकार-प्रकार बढ़ता ही गया. अगस्त-सितम्बर के बरसाती मौसम के साथ रोड किनारे के जानलेवा गड्ढे चालक के प्राण ही निकाल देते हैं। इधर मौत की तरह सामने से आने वाली वाल्वो गाड़ियाँ दम फुला देती हैं। घोष साहब ने तीन-चार बार चश्मा साफ़ किया। भगवान का नाम लेते रहे व गाड़ी चलाते रहे। ट्रकों को ओवर-टेक करने व क्राॅस करने में एक-दो बार ऐसा भी लगा कि अब बचना मुश्किल है। लेकिन चतुराई से बच गए। या किसी ने बचा लिया। उन्हें मालूम है कि रात में रास्ता अनुभव से पार होता है, ड्रायविंग से नहीं। रोड दिखाई नहीं देता और सामने की हेलोज़िन लाइट्स देखने नहीं देती। वैसे भी अब तक सर्विस पीरियड में करीब दो लाख किलोमीटर कार चला चुके घोष साहब एक कुशल ड्रायवर तो माने ही जा सकते हैं। उन्हें अपने आप पर भरोसा है। वे कहते-रहते हैं ‘ ईश्वर हमेशा मनुष्य के साथ रहता है।’

लेकिन दूसरे बड़े घाट पर घोष साहब ने दम तोड़ दिया। सामने से आने वाली एलपी ट्रक से कार बचाने में लेफ्ट फ्रंट व्हील पास के गड्ढे में धँस गया। ज़ोर की आवाज़ के साथ धम्म...............से इंजन बंद हो गया। आधा मिनट के लिए वह होश खो बैठे। हाथ-पैर फूल गए। सीने की धड़कन तेज़ हो गई। आँखों के सामने अँधेरा-सा छा गया। समझ नहीं पाए कि यह सब कैसे हो गया ? उन्हें उनसे ज़्यादा आॅफ़िस के ब्रिफकेस में रखे काग़जा़त की चिंता लगने लगी। वे कार से बाहर आ गए। पता नहीं कैसे कार की लाइट चालू रही।

हल्की-सी बारिश के कारण बाहर धुँध बढ़ती जा रही थी। दो-चार बार आसमान में बिजली चमकी। मौसम की नमी ने बदन में सिहरन पैदा कर दी। इस हत्यारी ट्रक के बाद केवल रात का सन्नाटा ही शेष बचा था। न कोई वाहन न किसी की आवाज़। घुप्प अँधेरा ही साथ था। सन्नाटे को तोड़ते हुए झिंगरूओं की आवाज़ से घाटी का वातावरण और डरावना लगने लगा। अँधेरे को अँधेरा मानो पकड़ कर खड़ा हो। कुछ देर में कार की लाइट भी कम हो गई। घोष साहब ने सोचा आज मृत्यु सामने खड़ी है। कितना त्रासद होता है मृत्यु से साक्षात्कार ?

अचानक ध्यान आया कि पिताजी कहते थे संकट में हनुमान को याद करना चाहिए। मन ही मन नमन-स्मरण किया व कार के अंदर बैठ गए। सोचने लगे आज की रात अंतिम रात होगी। तभी अंधेरे को चीरते हुए एक बलिष्ट व्यक्ति सफेद कपड़ो में उनकी ओर आने लगा। वह स्वयं को संभालते, तब तक तो किसी परिचित की तरह बोल पड़ा ‘अरे बाबूजी आप !................. क्या हो गया ?.................. गाड़ी गड्ढे में चली गई................................लाओ मैं धक्का लगाता हूँ। गाड़ी स्टार्ट करो।’................. उसके चेहरे पर एक जानी-पहचानी मुस्कान नाच रही थी व मन में अथाह उत्साह था।

घोष साहब ने यंत्रवत् चाबी लगाई और कार स्टार्ट हो गई। उस व्यक्ति के एक झटके से कार तीन फीट गड्ढे से बाहर आ गई। वह अपरिचित उनके पास ही कार में बैठ गया। कहने लगा..................................... अरे !.............अरे ! ......................... बाबूजी............................... आपने शायद  पहचाना नहीं। ‘मैं......................मैं रघुनाथ। उस दिन मेरी फ़ाइल कितनी ज़ल्दी निपटा दी थी आपने। घोष साहब ने कहा ‘अच्छा-अच्छा तुम रघुनाथ हो।’ हाँ, हाँ, बाबूजी आप तो हमारे गाँव में दौरे पर भी आए थे। हमारी बहुत मदद की है आपने।’ आदि............................................. आदि।

इस तरह रघुनाथ ने घोष साहब को आठ किलोमीटर का घाट वाला निर्जन रास्ता बातचीत में पार करवा दिया। रघुनाथ अंगरक्षक की तरह बैठा रहा। एक मोड़ पर उसने उत्सुकतापूर्वक कहा ‘बाबूजी ! मुझे यहीं उतरना है। ......................अब आप निकल जाओ।’ कहकर वह उतर गया।

घोष साहब ने रूफ़ लाइट चालू कर घड़ी देखी। रात के दो बज रहे थे। उन्होंने गेट लाॅक कर तुरंत रघुनाथ की तरफ़ गर्दन घुमाई....................................देखा, तो वहाँ कोई नहीं था।

आज तक वे रघुनाथ के बारे में सोच रहे हैं कि उससे कब मिले थे ? ऐसा कौन-सा गाँव है जहाँ का दौरा उन्होंने किया था ?

















9 सितंबर 2016

दर्द की ख़ुशियाँ

रीज़नल मैनेजर ने सम्पतकुमार का स्थानान्तर ‘विवेकानुसार अधिकार’ का उपयोग करते हुए तिरुचिल्लापलि से लखनऊ कर दिया। हेड आॅफिस से एप्रूवल भी हो गया। वैसे रीज़न में ही अधिकारी को रखने की परम्परा रही है। लेकिन सम्पत का केस अपवाद था। उन्होंने निरस्त करवाने के प्रयास भी किए, पर असफल रहे। सोच लिया कि जब काम ही करना है, तो क्या उत्तर और क्या दक्षिण। सारे देश को घर समझना चाहिए। फिर इस बहाने ही सही उत्तर भारत भी देख लेंगे। वहाँ के लोग और उनकी भाषा का अध्ययन-अनुभव हो जाएगा। कुछ ग़ज़लें और लिख ली जाएँगी। एक-दो पुस्तकें और तैयार हो जाएँगी। ऊपरवाला सब संयोग बनाता है। उन्होंने ट्रांसफर लेटर ऐक्सेप्ट कर लिया।

लखनऊ कार्यालय में चैम्बर मिलते ही मातहतों, बाबुओं यहाँ तक कि चपरासियों तक को बुला-बुलाकर अपने हाथ से मिठाई बाँटी गई। कहा गया कि यह मेरी बेटी ने स्पेशल आप सबके लिए बनाई है। बड़े साहब के हाथ से मिठाई मिले। किसे अच्छा नहीं लगेगा ? सारे आॅफिस में सम्पतकुमार के चर्चे होने लगे। नए साहब ने अपने मृदुव्यवहार और काम-काज के तरीकों से सबका मन जीत लिया। स्टेब्लिसमेंट की फाइलें उन्हीं के पास रहतीं। सम्पत यह देख लेते कि कौन कहाँ का रहने वाला है ? घर से कितनी दूरी पर है ? उसे नौकरी में असुविधा तो नहीं हो रही है ? उसके परिवार में कौन-कौन हैं। उसके क्या दुख-दर्द हैं ? उसका जन्मदिन कब है ? सम्पत ने अपनी पर्सनल डायरी में सबकी जन्म तारीखें नोट कर लीं।

जब कभी किसी कर्मचारी या अधिकारी का जन्मदिन आता, तो उसे अपने घर से मिठाई ले जाकर खिलाते। आग्रहपूर्वक कहते कि मेरी ओर से तुम्हारे जन्मदिन पर पूरे स्टाॅफ को मिठाई खिलाओ।

हर माह किसी न किसी का जन्मदिन आ ही जाता। सत्ताइस कर्मचारियों के स्टाॅफ में  कभी-कभी तो दो-दो बार जन्मदिन आ जाते। लेकिन सम्पत कभी नहीं भूले। उनकी बेटी को मिठाई बनाने का बड़ा शौक़ था। इस बहाने मन में उत्सवी माहौल हो जाता। दिन भर उनकी प्रसन्नता टपकती रहती. वे बेटी को बहुत प्यार करते थे। उनका यह सोच रहा कि कार्यालय भी एक प्रकार से घर का ही रूप है। पारिवारिक वातावरण प्रदान कर हम कर्मचारियों की कार्य-क्षमता को बढ़ा सकते हैं। अच्छे से अच्छा आउटपुट ले सकते हैं।

घर की जवाबदारियों के बाद भी कभी सम्पत ने ऑफ़िस का समय नहीं चुराया। वह समय पर तैयार होकर सुबह-दस बजे गाड़ी स्टार्ट कर लेते। उनके लिए दस-तीस का मतलब दस-तीस ही होता। हर कर्मचारी के जन्मदिन पर मिठाई का डिब्बा लाना वह कभी नहीं भूलते। ऑफ़िस के नीचे कार की आवाज़ यह बता देती कि सम्पत साहब की गाड़ी आ गई है। कर्मचारी घड़ी मिलाने लगते। उनके समय की पाबंदी ने कई कर्मचारियों को बिना लेटर दिए ही सुधार दिया।

इस बार नवम्बर में संयोग से एक के बाद एक चार जन्म दिन आ गए। रिकार्ड क्लर्क के जन्मदिन पर बेटी को गुलाब जामुन पसंद होने से पहली बार वे गुलाबजामुन ले आए। दूसरी बार जब प्यून का जन्म दिन आया, तो सोचा कि मावाबाटी ठीक रहेगी। तीसरी बार सीनियर असिस्टेंट का जन्म दिन आ गया, तब बेसन के लड्डू हो गए। अब चैथी बार सैकण्ड मैनेजर के जन्म दिन पर सम्पत समझ नहीं पाए कि कौन-सी मिठाई लाई जाएँ। काफी सोच-विचार के बाद मावे की चक्की का निर्णय लिया गया।

छब्बीस नवम्बर को सैकण्ड मैनेजर का जन्मदिन था। जन्मदिन के कारण वे आॅफिस लेट पहुँचे। बच्चों व पत्नी ने घर पर छोटा-सा कार्यक्रम आयोजित कर लिया था। लेकिन सम्पत तो सम्पत थे। समय के पाबंद। मजाल साड़े-दस बजे मिनट का काटा घड़ी में छः के अंक से आगे बढ़ जाए। सम्पत ने ग्यारह बजे सैकण्ड मैनेजर के आते ही उनके मुँह में मावे की चक्की का एक पीस ठूँस कर गले से लगा लिया . कहते हुए कि ‘लीजिए ! मैनेजर साहब हमारी ओर से मिठाई खाइये और  सारे आॅफिस में खुशियाँ बाँट दीजिए।’ मिठाई का डिब्बा हाथ में थामते हुए सैकण्ड मैनेजर को बड़ा अजीब-सा लगा। अंदर का संकोच चेहरे पर झलकने लगा। फिर भी साहब का कहा आदेश मानकर पूरे स्टाॅफ को मिठाई खिलाते रहे। सब ने सैकण्ड मैनेजर साहब के बदले सम्पत साहब की जय बोली।

शाम को सम्पत घर लौटे तो कुछ थके हुए से लगे। उन्हें अपना काम स्वयं करने की आदत है। रात में बुख़ार भी आ गया। सुबह उठने में देर हो गई। तैयार भी हुए पर मन नहीं लगा। हाथ-पैर दर्द करते रहे। फिर बिस्तर के हवाले हो गए। यों तो लखनऊ आए को आठ-दस महीने हो गए । पर आज पहली बार उन्हें ऑफ़िस फ़ोन करना पड़ा  ‘ भाई बुख़ार के कारण में नहीं आ पा रहा हूँ, आप लोग देख लेना।’

‘यस सर ! आय वील मैनेज हियर, डोंट वरी।’ कहकर सैकण्ड मैनेजर ने ऑफ़िस कार्य संभाल लिया। दिन भर हेड आॅफिस से कोई फ़ोन नहीं आया। सब कुछ ठीक-ठाक रहा। जो रिपोर्ट भेजना थीं, भिजवा दी गई। आज की सारी रसीदें कट गईं। पोस्टिंग हो गईं। सैकण्ड मैनेजर ने ध्यान से सारे लाॅक चेक कर लिये। शाम को घर जाते समय गाड़ी साहब के फ्लैट की तरफ मोड़ ली। सोचा कि दिन भर की रिपोर्टिंग हो जाएगी व साहब की तबीयत के हालचाल भी ले लेंगे।

मैन रोड के पास ही नई मल्टी में सम्पत साहब का 301 नम्बर का फ्लैट है। सीढ़ियों के पास ही नेमप्लेट लगी है। सम्पत कुमार, डिविज़नल मैनेजर,.......................................जैसे ही उन्होंने हाॅल का आधा टिका हुआ दरवाज़ा खोला, साहब को दवाइयों के कारण नींद आ गई थी। पास की टेबल पर मोबाइल, कुछ गोलियाँ, विक्स वेपोरब आदि रखे थे। यकायक दीवार पर निग़ाह चली गई। हाॅल के अनुरूप आॅफिस नुमा घड़ी लगी है। अरे ..................यह क्या ! एक दस-बारह वर्ष की हँसती-खिलखिलाती फ्राक पहनी सुंदर-सी बच्ची के फ़ोटो पर ताज़े फूलों की माला टँगी है..........................। उनकी विस्फारित आँखें खुली की खुली रह गईं। वे स्तब्ध रह गए। आँखें भर आईं. फ़्लैट में कोई हलचल नहीं. फ़ोटो के नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था।

‘तुम्हारी मिठाइयाँ’

29 जनवरी 2015

क्या दूँ मैं तुमको भला

पढ़ा तुम्हारी आँख  में, जैसा  पहली  बार
वैसा ही मिलता रहा, प्रिया तुम्हारा प्यार

वस्त्रों में तुमने चुना, गरिमामय परिधान
साड़ी ही  पाती  रही, सामाजिक  सम्मान

पत्र-पत्रिका डाक से, मिलतीं नित्य नवीन
सर्वप्रथम मुझको पढ़ो, होकर तुम तल्लीन

गूँजे हैं एकांत में, घर में ही पदगान
मीरा को सुनते रहे, दीवारों के कान

सदा व्यस्त गार्हस्थ में, तुम्हीं पीटतीं ढोल
शयन कक्ष की पुस्तकें, खोल रहीं हैं पोल

मोहपाश में बाँधता, प्रिये! मुझे उपहार
घिसा हुआ है देख  लो, कुर्ता  धारीदार

घर पर कोई था नहीं, दिखे नहीं पद-त्राण
तुम केवल मंदिर गईं, निकल गए थे प्राण

क्या दूँ मैं तुमको भला, क्या है मेरे पास
दोहे हैं  दो- चार ये, यह दौलत है  ख़ास

बिंदिया चमके भाल पर, भरा रहे सिंदूर
यही कामना है सदा, खुशी मिले भरपूर

बाह्य सौंदर्य हो न हो, अंदर रहे कवित्व
प्रथम दृष्टया मोह ले, ऐसा हो व्यक्तित्व

18 जनवरी 2015

प्रिये ! तुम्हारे पत्र

पत्र देखकर यों लगा, तुम ही खड़ी समक्ष
बिना पढ़े ही महकता, स्वयं अध्ययन कक्ष

निजी पत्र पीछे रखे, आगे रखीं किताब
जैसे रखे सहेज कर, ताजे़ लाल गुलाब

रखीं पुस्तकें धूप में, दिखे तुम्हारे पत्र
बिना पढ़े मस्तिष्क में, कौंध गए वे सत्र

घर में थाती नेह की, कहीं नहीं अन्यत्र
अलमारी में हैं सभी, प्रिये! तुम्हारे पत्र

चलन पुराना हो गया, प्रेम-प्यार के पत्र
अब युगलों के हाथ में, चलित फोन सर्वत्र

मिली पुरानी डायरी, दिखे तुम्हारे चित्र
जैसे मन के कक्ष में, आ बैठा हो मित्र

तुम्हें नया एनक मिला, मुझे हुई तकलीफ
घर में होती ही नहीं, बिना वज़ह तारीफ

लाख बुरी तबियत रहे, जाग बिताओ रैन
बिना किए गृहकार्य के, तुम्हें न पड़ती चैन

सुबह-शाम गरमागरम, भोजन अति स्वादिष्ट
मिला तुम्हारे हाथ का, तब हम हुए विशिष्ट

रखकर भूला हूँ सदा, मैं ही अपनी चीज़
तुमने ही कल खोज दी, मेरी हरी कमीज़