उसने मज़हब त्यागकर, रहन रखा ईमान ।
सौदा करने मौत का, उठा लिया सामान ।।
ख़ून बहाना षौक है, दहषतगर्दी धर्म ।
जल्लादी अरमान को, क्या आएगी षर्म ।।
सीमाएं सब लांघ कर, मर्यादा कर भंग ।
मांग रहा है देष अब,आर-पार की जंग ।।
जड़ें खोंदकर फेंकिए, आकाओं की ओर ।
वर्ना अब आतंक पर, काबू कठिन कठोर ।।
हाथों में हथियार ले, दिल में छुपा जुनून ।
आतंकी नित पी रहा, निर्दोषों का खून ।।
सूनी करके गोदियाँ, पोंछ रहा सिंदूर ।
होली खेले ख़ून की, आतंकी दस्तूर ।।
बरसों से समझा रहे, जाँत-पाँत को भूल ।
कट्टर पंथी आदमी , चाट रहा है धूल ।।
लगा ज़िन्दगी दाँव पर,समझ रहा जो षान ।
आतंकी ने मौत का, जुटा लिया सामान ।।
अपना ली जब आपने, हिंसा, खून, कराह
निकलेगी फिर किस तरह, प्रेम-प्यार की राह।।
मकसद है कब धर्म का, फैलाना आतंक ।
मानवता के नाम पर, काला, क्रूर, कलंक ।।
5 अप्रैल 2011
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